मन बहुत बौरा रहा है
ठंडे-ठंडे पानी में मुझे
ये क्या हो गया है
जैसे झील में कोई
कमल खिल गया है।
प्रीत में जैसे कोई
मन-मीत मिल गया है
प्यासे को जैसे कोई
सावन मिल गया है।
बहते दरिया में जैसे
खिवैया मिल गया है
तपती धूप में जैसे
ठंडा पवन मिल गया है।
ढलती साँझ में कोई आए
मिले तो बात बने
प्रेम में मतवाला मन
अब बहुत बौरा गया है।
— चन्द्र शेखर शर्मा चन्द्रेश
