कविता
भुला भी नहीं सकतेबुला भी नहीं सकते। कैसा दर्द दिया है तुमनेइस बिना जी नहीं सकते। ये कैसी चदरिया दी
Read Moreसियासत अब सियासत नहीं रहीरोम रोम में उनके तिजारत भरी रही। वे अवाम को देखते हैं हिकारत सेवोट लेकर, कुर्सी
Read Moreमधुमयि तुम्हारी हैं स्मृतियांऔर प्रातः की सूर्य-सी रश्मियां। ये है प्रेम का संधि काल औरकहलाता है वसन्त काल। प्रेम और
Read Moreजिस घर में जन्मती हैं बेटियांउस घर में आती हैं समृद्धियां।गया समय, जब पुत्र जन्म परघर-घर में बजती थीं थालियां।अब
Read Moreनहीं, अब मन नहीं करताना पढ़ने, ना लिखने का।कुछ विरक्ति होने लगी हैमन भी अनमन रहता है।शंकाओं से रहता है
Read Moreविवाह तेरा व मेरा हैइसी सोच को धोना हैविवाह दो तनों का नहींये कुल कुटुंब में होना हैये नए दौर
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