सियासत में तिजारत
सियासत अब सियासत नहीं रही
रोम रोम में उनके तिजारत भरी रही।
वे अवाम को देखते हैं हिकारत से
वोट लेकर, कुर्सी पाई हिफाजत से।
जल से निकलते कमल देखे हैं हमने
पर उनको कीचड़ में डूबते देखा सबने।
जितनी गंदगी मचानी है मचा लो तुम
जिल्लत की सांसों से क्या बचोगे तुम।
एक अंगुली ने सांसद बनाया तुमको
उसी उंगली से सड़क पर रहोगे तुम।
उन्होंने हमसे से कहा रहो शराफ़त से
हमने कहा, तुम बाज आओ शरारत से।
हमने थोड़ी सी शिकायत क्या कर दी
तुमने सदा के लिए अदावत कर ली।
— चन्द्र शेखर शर्मा चंद्रेश
