अलसाता मौसम
मधुमयि तुम्हारी हैं स्मृतियां
और प्रातः की सूर्य-सी रश्मियां।
ये है प्रेम का संधि काल और
कहलाता है वसन्त काल।
प्रेम और माधुर्य से भरे नेह
मुझे बुला रहे हैं बारंबार।
चला ऋतुराज का कामबाण
और टूट गए सब बंधन।
बड़ा अलसा रहा है मौसम
प्रेममग्न हो रहा है मन।
तुम और मैं, मैं और तुम
दो तन, आज हो गए हैं एक।
— चन्द्र शेखर शर्मा चंद्रेश
