कविता

कविता – बच्चे को मारिए मत, उसका मन पढ़िए

जिस हाथ को पकड़कर उसने दुनियाँ में चलना सीखा
उसी हाथ से पड़े थप्पड़ ने रिश्तों से डरना सीखा,
वह चुप हो गया तो मत समझना कि बच्चा सुधर गया,
उस मासूम ने बस अपना दर्द भीतर रखना सीखा था।

मारोगे तो गलती छिपेगी,सच कहना छूट जाएगा,
डर की दीवारों में बचपन धीरे-धीरे टूट जाएगा,
फिर मत कहना मेरा बच्चा मुझसे झूठ क्यों बोलता है?
सच पर सज़ा मिलेगी तो झूठ ही कवच बन जाएगा।

छोटी-सी गलती पर अपना बड़ा क्रोध मत उतारो,
अपनी थकान,तनाव, हार का बोझ उस पर मत डालो
थप्पड़ बच्चे की गलती नहीं,अपना संयम मत हारो
अनुशासन के नाम पर मासूम मन को मत मारो।

आज डर से वह सिर झुकाकर चुप हो जाएगा,
कल बड़ा होकर ही रिश्ते से दूर हो जाएगा,
बचपन में घर को उसकी सबसे सुरक्षित जगह होना था,
वही घर डर बन गया तो विश्वास कहाँ लौट पाएगा?

बच्चे फूल नहीं कि बस अपनी पसंद के रंग में ढालोगे,
वे भी मन रखते हैं,कब तक आँसू को अनुशासन मानोगे?
किशन समझाकर बात बन सकती है, हाथ क्यों उठाना है
बच्चे को नहीं,अपने गुस्से को संस्कार सिखाना है।

— किशन सनमुखदास भावनानी

*किशन भावनानी

कर विशेषज्ञ एड., गोंदिया

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