उलझनें
जहां जहां डालो नज़र,
वहां उलझनें, उलझनें, उलझनें,
बिना उलझन
कैसा लगेगा जीवन?
हम क्यों बनाये जीवन को रेगिस्तान?
उलझनों से जीवन बनेगा गुलिस्तान,
उलझनोको स्वीकारो,
और स्नेह से संवारो,
हरपल उन्हें
सुलझाते रहो,
जिंदगी का लुत्फ उठाते रहो।
— पुष्करराय जोषी
