ग़ज़ल
दिन लगे हैं सुहाने तुम्हें देखकर।
प्यार आ ही गया है तुम्हें देखकर।।
देख कोई अभी तक जँचा ही नहीं।
हम लगे गुनगुनाने तुम्हें देखकर।।
मुफ़लिसी में जिए अभी तक सुनो।
लगीअमीरी ही छाने तुम्हें देखकर।।
आज कोई नहीं द्वार या घर ही मिला।
मिल गये हैं ठिकाने तुम्हें देखकर।।
प्रेम का रोग अब तो लगा देख ले।
जी रहे हैं दिवाने तुम्हें देखकर।।
अब हँसी है हमारी तुम्हारे लिए।
हम लगे खिलखिलाने तुम्हें देखकर।।
अब हटा दो न चिलमन हमारे लिए।
दिल लगा है मनाने तुम्हें देखकर।।
— रवि रश्मि ‘अनुभूति’
