लघुकथा : लक्ष्मणरेखा
लक्ष्मणरेखा “हद होती है बेशर्मी की ! कम से कम बच्चों की तो शर्म की होती !” विछिप्त सा सोहम
Read Moreलक्ष्मणरेखा “हद होती है बेशर्मी की ! कम से कम बच्चों की तो शर्म की होती !” विछिप्त सा सोहम
Read Moreबहुत ही संवेदनशील थी वो ! खून देखते ही उसे उबकाई आनी शुरु हो जाती थी ! आज उसके घर
Read More“कल किसने देखा? यूँ ही कल की फिक्र में यह ना खाओ, पानी ना बहाओ और तो और… अब बेवकूफों
Read Moreसदियों पहले टकराए ग्रह कहते हैं उससे धरती बनी ! “आग का गोला” थी तब यह, फिर धीरे-धीरे शाँत हुई
Read Moreमुझको भी गर… कोई जिन्न मिल जाता, और पूछता मुझसे… मेरी अभिलाषा ! बिन सोचे उसको… मैं कह जाती, काश
Read Moreअरुण जी की दूरदर्शिता का हर कोई कायल था ! कोई भी समस्या हो, कैसी भी समस्या हो, सब का
Read Moreनाजुक सा रिश्ता, तेरा मेरा कसमों से परे, बंधनों से परे !! इक डोर है बाँधे, हम दोनों को दूर
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