लघुकथा- आत्मग्लानि
“चप्पल घिस गयी बेटा, एक लेते आना | मैं थक गया हूँ, अब सोऊंगा |” “पापा! दो साल से प्रमोशन रुका पड़ा है | दे दीजिये न बाबू
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Read Moreआज मचा है हो हल्ला (शोरगुल ) अजीब सी शांति होगी कल होते है रोज बलात्कार जागती नहीं मगर सरकार
Read Moreखूब साज सृंगार कर सज-धज रही थी ! महकते हुए सुंदर रंगबिरंगे फूल खूबसूरती में चार चाँद लगा रहें थे
Read Moreऔरत की किस्मत में कितने गम है पुरुष कहते यह तो बहुत कम है| औरत की आँखे होती हमेशा नम
Read Moreछिड़कते हैं नमक हमारे घावों पर ये दुनिया वाले बिदकते हैं छोटी-छोटी बातों पर ये दुनिया वाले अक्सर पहाड़ राई
Read Moreहमें हैरान-परेशान देख एक व्यक्ति ने हमसे पूछा क्या खोज रही है आप ? हमने कहा ही था कि इंसानियत
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