गरीबी
मंजीरे बज रहे थे ,पर सांसें उदास थी । ढोलक की थाप पर बेसुरों की आग थी । रोटियों की
Read Moreकुछ दिनों से लगता है जैसे मैं नहीं रही खो गयी हूँ भीड़ भरे रास्तों पर फिर कहीं न कोई
Read Moreदिये की रौशनी में अंधेरों को भागते देखा अपनी खुशियों के लिए बचपन को रुलाते देखा। दीवाली की खुशियां होती
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