कविता

इतवार

आज सुबह सुबह ही
याद आ गया
बचपन का वो इतवार
आराम से उठना
अपनी मनमर्जी के साथ
उठते ही मां को अपनी
पूरी दिनचर्या बताना
क्या क्या मुझे खाना है
और क्या पहनना
आज ना ही कोई पढाई
और ना ही चैनल बदलना
बङे रोब से कहती थी
मां अपने हाथो से खिलाओ
पापा मेरी खातिर आप घोङा बन जाओ
भैया आप मेरा थोङा सा होमवर्क कर दो
दीदी मेरे लियेउस पङोसिन सहेली से लङ दो
दादाजी के साथ
आज घुमने जाऊंगी
ढेर सारी चोकलेटे और आईस्क्रीम खाऊंगी
अपनी सहेलियो पर मै
अपना रोब जमाती थी
हर इतवार उन्है अपने घर बुलाती थी
उस सुहानी सुबह का
स्मरण कर रही थी
तभी सुना मेरी बेटी
कुछ मुझसे कह रही थी
मम्मा आप ने टीवी पर भजन क्यू लगाया
मेरी नींद को समय से
पहले क्यू खुलवाया
अब जल्दी से मेरे लिये
कुछ अच्छा पकाओ
ये दाल चावल और रोटी
किसी और की खिलाओ
पापा को बोलो आज मे
कही बाहर जाऊंगी
अपने दोस्तो के संग
ये संडे मनाऊँगी
दीदी को बोलो
मेरी जासूसी ना करे
दोस्तो के बीच मेरे
अपनी टांग न धरे
भैया अपने काम से काम ही रखे
मुझसे मेरी पढाई का जिक्र ना करे
और मे दादी के संग मे कही नही जाने वाली
मेरी ये मैं छुट्टी नही यूही बिताने वाली
बाते सुन रही थी बेटी की
मै बिना पलक झुकाऐं
ऐसी परवरिश नही थी मेरी
ये गुण कहा से आये
क्या स्वतंत्रता के नाम पर
हम इतने आगे बढ गये
कि अपनी संस्कृति सभ्यता को
यू हीन कर गये
एक वो इतवार था
जिसे हम जीते थे
इक आज ये संडे है
जिसे सिर्फ जीते है

परिचय - एकता सारदा

नाम - एकता सारदा पता - सूरत (गुजरात) सम्प्रति - स्वतंत्र लेखन प्रकाशित पुस्तकें - अपनी-अपनी धरती , अपना-अपना आसमान , अपने-अपने सपने ektasarda3333@gmail.com

3 thoughts on “इतवार

  1. यह बचपन तो हमेशा याद आता है लेकिन किया करें जीना इसी का नाम है .

Leave a Reply