कविता

पागल

पागल़़…!!!
यही कहता है जमाना ।
हटकर लीक से जो हूँ
कर नहीं पाता
कदम-ताल जमाने संग
होता नहीं सहन
अन्याय…अत्याचार
हो किसी संग भी ।
बिना डरे अंजाम से
जताता हूँ विरोध
भ्रष्टाचार के विरुद्ध
पर पाता हूँ स्वयं को…अल्पसंख्यक !!!
तभी तो संख्या बहुल
कह पाते हैं-
‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता’
समझते हैं … पागल !!!

परिचय - सुधीर मलिक

भाषा अध्यापक, शिक्षा विभाग हरियाणा पिता का नाम :- श्री राजेन्द्र सिंह मलिक माता का नाम :- श्रीमती निर्मला देवी निवास स्थान :- सोनीपत ( हरियाणा ) लेखन विधा - हायकु, मुक्तक, कविता, गीतिका, गज़ल, कहानी समय-समय पर साहित्यिक पत्रिकाओं जैसे - शिक्षा सारथी, समाज कल्याण पत्रिका, युवा सुघोष, आगमन- एक खूबसूरत शुरूआत, ट्रू मीडिया,जय विजय इत्यादि में रचनायें प्रकाशित

5 thoughts on “पागल

    1. आशा पाण्डेय ओझा जी आपकी सुन्दर टिप्पणी के लिये सादर नमन

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