पहेलियाँ – २

(1)

गोलू-मोलू, सीधा-सादा
मानों फटने को आमादा
जितना कसके इसको मारो
दूर भागता उतना ज्यादा

 

(2)

हरे, लाल, नीले, पीले
इसमें चार मकान
सोलह राही आते-जाते
फिर सबकुछ सुनसान

 

(3)

रूई के बंडल जैसा है
बित्तेभर कानोंवाला
नहीं पकड़ में आता भैया
ये है फुर्ती का प्याला

 

(4)

हरे खोल में लाल धमाका
संग नगीने कुछ काले
पानी का भंडार यहाँ है
सेहत के ये रखवाले

 

(5)

जरा फूँक दो, फूल के कुप्पा
सूई से ये डरते हैं
जरा जोर से चपत लगे बस
गुस्से से फट पड़ते हैं

 

 

उत्तर (1) फुटबॉल (2) लूडो (3) खरगोश (4) तरबूज (5) गुब्बारा

परिचय - कुमार गौरव अजीतेन्दु

शिक्षा - स्नातक, कार्यक्षेत्र - स्वतंत्र लेखन, साहित्य लिखने-पढने में रुचि, एक एकल हाइकु संकलन "मुक्त उड़ान", चार संयुक्त कविता संकलन "पावनी, त्रिसुगंधि, काव्यशाला व काव्यसुगंध" तथा एक संयुक्त लघुकथा संकलन "सृजन सागर" प्रकाशित, इसके अलावा नियमित रूप से विभिन्न प्रिंट और अंतरजाल पत्र-पत्रिकाओंपर रचनाओं का प्रकाशन