ग़ज़ल

 

भूख दुनियाँ से मिटा कर देखते हैं
रोते बच्चों को हँसा कर देखते हैं

भूल जाता हूँ जमाने भर के गम को
जब हमें वो मुस्कुरा कर देखते हैं

मन्दिरों में जा के हासिल कुछ न होगा
नेकियाँ जग में लुटा कर देखते हैं

तिश्नगी में जिंदगी करके बसर हम
प्यास दरिया की मिटा कर देखते हैं

टेक देंगी मुश्किलें घुटने जहां की
दिल में इक जज्बा जगा कर देखते हैं

क्यों उजड़ता जा रहा गुलशन मिरा ये
मुल्क को फिर से सजाकर देखते हैं

पेड़ पर लटका न कोई भी मिलेगा
रोटियां मिल बाँट खाकर देखते हैं

— धर्म पाण्डेय