ग़ज़ल

तू मेरे सहारे , मैं तेरे सहारे ।
न तुम थे हमारे, न हम थे तुम्हारे ।

सितम ढा के मुझको रुलाओ न जालिम
क़ि बुझ जाते है आँसुओं से शरारे।

समुन्दर की गहराई क्या उनको मालुम
जो चलते है बच कर किनारे किनारे ।

जिन्हें पढ़ने लिखने को भेजा गया था
वतन बाँटने  को , लगाते हैं नारे ।

खिलाने को रोटी बदन बेचती हूँ
कहाँ से मैं लाऊँ खिलौने तुम्हारे ।

खुदाया मेरे सिर्फ इतना करम कर
मुसीबत पड़े “धर्म” हिम्मत न हारे ।

— धर्म पाण्डेय