मेरी भी सुनो

हाड़ मांस की गठरी ना हूँ
 मैं मेरा एक दिल भी है
चंचल ,चितवन नैन नशीले
और अदा कातिल भी है
हिरणी जैसी चाल है मेरी
 काले लंबे बाल भी है
क्या ये खता है मेरी बोलो
क्यों जी का जंजाल है ये
चंद कागज के टुकड़े देके
मनमानी कर जाते हो
 मर्द बने घुमते फिरते हो
ताकत पर इतराते हो
देख के मुझको याद नहीं क्यों
आते तुमको रिश्ते नाते
क्या अपनी बेटी बहनों से भी
करते हो ऐसी  बातें
बेटी लगती हूँ मैं किसी की
 और किसी की बहन भी हूँ
पर नजरों में क्यों सबकी मैं
मस्त , महकता चमन ही हूँ
जी भर नोंचा और खसोटा
जी भर अत्याचार किया
मनमानी करके चल देना
पर ना कभी विचार किया
तुम जैसे कुछ मर्द ना होते
क्यों लाते हम जैसों को
जाल डालकर हमें फंसाते
पूजते हैं ये पैसों को
कदम कदम बाजार सजा है
 कदम कदम पर पंगे हैं
इज्जत का दम भरनेवाले
 खुद से होते नंगे हैं
हम बिकते हैं बिकते रहेंगे
जब तक सिक्के खनकेंगे
अंत नहीं ये अंतहीन है
जब तक लोग न समझेंगे

परिचय - राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।