लेख– महिला सशक्तिकरण के लिए पुलिस महकमे में महिलाओं की भर्ती भी तो हो

संविधान में समान अधिकार, अवसर की समता का ज़िक्र किया गया है। संविधान में कहीं भी स्त्री-पुरूष में विभेद नहीं किया गया है। पर हमारा समाज औऱ व्यवस्था मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक व्यवस्था को त्याग क्यों नहीं पा रहीं। 21वीं सदी का भारत भी लैंगिक असामनता से प्रताड़ित है। तो सिर्फ़ देश में गार्गी, अहिल्याबाई की गौरवगाथा का ज़िक्र करते हुए कह देना कि एक बेटी दस बेटों के बराबर होती है, से स्त्रियों की दशा नहीं सुधर सकती। ऐसे में सवाल यहीं जब हमारा इतिहास इतना सुंदर औऱ बराबरी का हिमायती रहा है, फ़िर वर्तमान समय में स्त्रियों के अधिकार सीमित क्यों होते जा रहें हैं। यह बात रहनुमाई व्यवस्था के साथ समाज को सोचना होगा। अगर देश में स्त्रियों की दशा औऱ दिशा सुधारने की राजनीतिक पहल करने की बात मुखर होती रहती है। फ़िर अगर भोपाल में मान लिजिए एक लड़की के साथ सामाजिक या शारीरिक उत्पीड़न होता है, तो हो सकता है, कि मुकदमा दर्ज करने और आपबीती सुनने वाला कोई पुरुष हो। यह स्थिति आज हमारे समाज में क्यों है? यह भी व्यवस्था को सोचना होगा। क्यों आज के समय में स्त्रियों को समान काम का समान वेतन नहीं मिल पाता? क्या कारण है, कि कृषि में लगी महिला शक्ति को कृषक की श्रेणी में आज़तक शामिल नहीं किया जा सका।

ऐसी धारणा कहे या निर्वाद सत्य, कि पीड़ित महिलाएं अपनी आपबीती पुरुष पुलिस महकमे के समकक्ष बताने में सहज महसूस नहीं करती। फ़िर उन्हें न्याय कैसे मिलता होगा, यह समझ आता नहीं। अगर हर राज्य की पुलिस में कम से कम 33 फीसदी महिला अफसर और कर्मचारी होने का दम्भ भरा जाता है, तो यह समय की मांग भी है। जिस पर अमल रहनुमाई व्यवस्था को करना होगा, क्योंकि महिलाओं के प्रति सामाजिक व्यवस्था अपनी नीति और नियत में बदलाव करती दिख नहीं रहीं। तो यह महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा रोड़ा है। पुलिस बल में महिलाओं की बेहतर उपस्थिति सुनिश्चित करने की पहल 2009 में मनमोहन सिंह सरकार ने किया था। जब सरकार ने कहा था, कि सभी केंद्र शासित प्रदेशों और राज्य सरकारों में कम से कम पुलिस बल में महिलाओं की संख्या 33 फीसदी की जाए। पर यह महिलाओं के अधिकार के प्रति रहनुमाई व्यवस्था की अचेतन अवस्था का परिणाम है, कि महिला अपराधों में वृद्धि 2018 आते-आते काफ़ी तेज़ी के साथ बढ़ रही है, लेकिन पुलिस बल में महिलाओं की संख्या में कोई विशेष इज़ाफ़ा होता नहीं दिख रहा। ये बात साबित करती है, कि हमारा समाज महिलाओं के प्रति संवेदनहीनता का शिकार तो है ही, रहनुमाई व्यवस्था भी महिलाओं को त्वरित न्याय औऱ भय मुक्त वातावरण देने के प्रति कितनी सज़ग है? इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है, कि देश में सिर्फ़ 586 महिला पुलिस थाने हैं, यानि हर जिले में एक महिला पुलिस थाने भी नहीं क्योंकि देश में लगभग 641 जिले हैं। यह आलम उस वक्त है, जब देश में अपराध सबसे ज़्यादा महिलाओं के खिलाफ ही होते हैं।

अगर देश की राजधानी दिल्ली की बात की जाए, तो बीते वर्ष के जून माह तक महिला उत्पीड़न के 79 मामले में से 35 मामलो की जांच का जिम्मा पुरुष अफसरों के पास था। फ़िर देश के अन्य हिस्सों की क्या स्थिति होगी, इसका सहज आंकलन किया जा सकता है। पुरूष पुलिस बल द्वारा महिलाओं के प्रति हुए अपराध की जांच का कारण पूछे जाने के बाद अगर गृहमंत्री कहते हैं, कि ऐसा महिला पुलिस बल की कमी के कारण हो रहा, फ़िर इसमें सुधार कब होगा, यह लाख टके का सवाल है। देश में सिर्फ़ 7 फ़ीसद महिला पुलिस बल होना चिंता का विषय है। वैसे गिनती में ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट के मुताबिक भारत में सिर्फ एक लाख 20 हजार महिला पुलिसकर्मी हैं। इनमें से कुछ राज्यों में हालात तो बेहद बुरे हैं। यह बहुत दयनीय स्थिति है, कि आधी आबादी की सुनवाई करने के लिए सिर्फ़ गिनती के एक लाख से थोड़ी अधिक महिला पुलिसकर्मी है। हमारे देश में पुलिसकर्मियों का महिला उत्पीड़न में लिप्त होना भी कोई नई और विचित्र बात नहीं। ऐसे में अगर महिला पुलिसकर्मी की देश मे कमी है, तो फ़िर महिला सशक्तिकरण की बात भोथरी लगती है। अगर जनवरी 2015 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यह अनिवार्य किया था, कि पुरुष सिपाहियों की कमी को महिलाओं को भर्ती करके पूरा किया जाए, फ़िर इस पर अब तक अमल क्यों नहीं हुआ। मध्य प्रदेश, बिहार, गुजरात, सिक्किम और झारखंड जैसे राज्य अगर 30 फ़ीसद पुलिस पद महिलाओं के लिए आरक्षित किए हुए हैं, तो फ़िर उस पर अमल क्यों नहीं किया जाता। विकसित देशों में पुलिसबल में महिलाओं की संख्या अच्छी खासी है। तो उनसे फ़िर कोई सीख देश लेता क्यों नहीं। इंग्लैंड में पुलिस बल में 28 फ़ीसद से अधिक महिलाएं है। फ़िर हमारे देश में बदलाव क्यों नहीं दिख रहा। तो क्यों न महिलाओं के प्रति अपराध में शीर्ष पर रहने वाला प्रदेश मध्यप्रदेश से ही कोई सुधार की लहर बहनी शुरू हो, जो देश के लिए महिला सशक्तिकरण की मिसाल बन सकें।

परिचय - महेश तिवारी

मैं पेशे से एक स्वतंत्र लेखक हूँ मेरे लेख देश के प्रतिष्ठित अखबारों में छपते रहते हैं। लेखन- समसामयिक विषयों के साथ अन्य सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर संपर्क सूत्र--9457560896