लेख– नरेश अग्रवाल का भाजपा में शामिल होना क्या कह रहा

राजनीतिक राजधर्म औऱ नीति का विखंडन जिस गति से हो रहा, ऐसे में अगर तत्कालीन दौर में राजनीतिक विचारधारा की तुलना वैश्या से की जाए। तो किंचित ग़लत नहीं होगा। आज राजनीति के मजनूं सिर्फ़ सत्ता की कुंजी से प्यार जो कर बैठे हैं। नीति औऱ राजनीतिक धर्म तो सिर्फ़ दिखावा है, असल मक़सद तो सत्ता हथियाना है। ऐसा इसलिए कहा, क्योंकि आज देश की राजनीतिक पार्टियां देश औऱ समाज के लिए जो सार्थक मुद्दे हैं, उसे रोशनदान पर रख चुकी हैं। जाति, धर्म पर बरगलाने की सियासत हो रहीं है। अब जब उत्तरप्रदेश में भाजपा अपने प्रचंड अवतार में थी, फ़िर उसे नरेश अग्रवाल की क्या ज़रूरत थी। स्वार्थ तो दोनों तरफ़ का रहा होगा, लेकिन इससे आहत जनता की भावनाएं होती है। वह बात ये राजनीतिक सियासतदां क्यों नहीं समझते। अगर बात नरेश अग्रवाल की जाए, तो वे ऐसे नेता हैं, जिन्होंने हिन्दू धर्म के देवी-देवताओं तक का अपमान करने से बाज़ नहीं आए। फ़िर हिंदुत्व का झंडा बुलंद करनी वाली भाजपा नरेश अग्रवाल को पार्टी में शामिल कराके कैसे सहज हो सकती है? या फ़िर आज की परिस्थितियों में सामाजिक औऱ धार्मिक सभी एजेंडे को सिर्फ़ राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूर्ति का साधन मान लिया जाए। नरेश अग्रवाल औऱ अन्य विपक्षी दलों के नेता जिस तीव्र गति से भाजपा का दामन थाम रहें है। उसे देखकर लगता है। भले ही भाजपानीत केंद्र का सत्ताधारी दल गंगा को स्वच्छ कराने में मशक्कत कर रहा, लेकिन भाजपा ख़ुद मोझदायनी गंगा जरूर बन गई है। जिसके नज़दीक आते ही सभी राजनीतिक पाप, पुण्य में तब्दील हो जाते हैं, जो भाजपा से अलग रहते हुए आकंठ भ्रष्टाचार औऱ अपराध में डूबे थे। उससे सियासतदानों को राजनीतिक मोझ प्राप्त हो जाता है।

देश के प्रधानमंत्री मोदी भले भाजपा को जो राजनीतिक कोढ़ कांग्रेस को लगा था, उससे बचने की बात करते हो। पर जिस राह पर आज भाजपा कांग्रेसमुक्त भारत बनाने के लिए चल रहीं। उसे देखकर लगता यहीं है, भाजपा भी अन्य दलों से अलग नहीं। उसे भी मात्र सत्ता का स्वाद चखते रहने की हसरत है। फ़िर उसके लिए चाहें जिस स्तर की राजनीति करनी पड़े। बीते सप्ताह में भाजपा ने महाराष्ट्र से नारायण राणे को राज्यसभा उम्मीदवार बनाया है, तो बीते दिनों ही नरेश अग्रवाल को पार्टी ने माला पहनाकर पार्टी में शरण दी। शिवसेना से राजनीति शुरू करने वाले नारायण राणे कांग्रेस होते हुए भाजपा में तो नरेश अग्रवाल कांग्रेस से शुरुआत करते हुए सपा के रास्ते भाजपा में आकर राजनीतिक मोझ को प्राप्त करने जा रहें हैं। अग्रवाल वहीं शख़्स हैं, जो भाजपा की नीतियों की घनघोर घटा बनकर धज्जियां उड़ाते थे। ऐसे में भाजपा उनको अपने पाले में लाकर क्या साबित करना चाहती है? वैसे आयाराम-गयाराम की सियासत कोई नई बात नहीं। पर अगर यह दल-बदल बिना किसी विचार औऱ नीति के निजी हित के लिए हो रहा, फ़िर यह लोकतंत्र को कमज़ोर करने वाला कृत्य ही समझा जाना चाहिए। दल-बदल आज़ादी के वक्त से ही निरन्तर चल रहा, पर शायद राजनीतिक विचारधारा ही क्षीण हो गई है। जो जनसरोकार के मुद्दे से आंखें मूंद रहीं। आज़ादी के शुरुआती दौर में भी चक्रवर्ती राजगोपालाचारी औऱ श्यामा प्रसाद मुख़र्जी जैसे सियासतदानों ने दल-बदल किया था, लेकिन वह दल-बदल राजनीतिक राजधर्म की कसौटी पर सोलह आने खरा था। उस तरीक़े के राजनीतिक आचार औऱ विचार पर दल-बदल न होना ही लोकतंत्र को धत्ता बता रही है। आज राजनीति में सक्रिय लोगों के लिए अपनी पार्टी की विचारधारा या राजनीतिक मूल्यों के प्रति निष्ठा सिर्फ़ मज़ाक बनकर रह गई है, औऱ परमोद्देश्य अगर स्वहित ही शेष बचा है। फ़िर यह देश की अवाम के भद्दा मज़ाक ही है।

श्यामा प्रसाद मुख़र्जी जैसी शख्सियत को अपना आदर्श बताने वाली भाजपा अभद्र औऱ बेतुके बयान के नरेश को भाजपा में शामिल कर क्या संदेश देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को देना चाहती है, यह सवाल अवाम को भाजपा से ख़ुद पूछना चाहिए। नरेश अग्रवाल बेतुके बयान के लिए ही नहीं महिलाओं औऱ हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करने वाले राजनीतिक खिलाड़ी हैं। जिनको व्हिस्की में विष्णु, रम में श्रीराम, जिन में माता जानकी और ठर्रे में हनुमान दिखते हैं, औऱ एक महिला को फिल्मों में नाचने वाली बताने की राजनीतिक कलाकार है। क्या भाजपा उसे अपने अंचल तले लाकर अपनी विचारधारा औऱ नीतियों को कमजोर नहीं कर रही? नरेश अग्रवाल का भाजपा में शामिल होना तत्कालीन राजनीति के सामने कई प्रश्न को उद्देलित करने का कार्य किया है। नरेश का भाजपा में शामिल होना बताता है, कि कैसे मौकापरस्त राजनीति करने वालों के लिए सभी दलों के दरवाजे खुले हैं। और कैसे चाल, चरित्र औऱ चेहरे एकसे सभी दलों के हैं, सिर्फ़ सत्ता हथियाने के लिए मुखौटों की राजनीति हो रहीं है।

अब ऐसे में सवाल यही जब भाजपा भी अन्य दलों की अनुगामी ही बनती जा रहीं, सत्ता साधना के लिए। फ़िर उसमें औऱ अन्य में फ़र्क़ ही क्या? आज लोगों को यह नहीं सूझ रही कि भाजपा अपनी बनी-बनाई साख पर बट्टा क्यों लगा रही। और नरेश जैसे चेहरों को शामिल करके उसे क्या हासिल होगा? अगर नरेश भाजपा में अकेले आएं हैं, तो उससे भाजपा पर विशेष फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला। वैसे भाजपा की जो स्थिति आज उत्तरप्रदेश में है, उस स्थिति में किसी दूसरे दल का पूरा कुनबा भी शामिल हो जाए, तो विशेष फ़ायदा नहीं होने वाला। फ़िर भाजपा अपनी बनी-बनाई साख को धूमिल क्यों कर रहीं? नरेश और नारायण को भाजपा अपने में शामिल कर अपनी राजनीतिक शुचिता औऱ मर्यादा का ही छीछालेदर कर रहीं है। भले ही आज राजनीति करने का तरीका बदल गया है, जाति, धर्म औऱ भावना में जनता बहक जाती है, लेकिन लोकतंत्र में सिर्फ़ नेता की छवि ही मायने आज के दौर में नहीं रखती। जनता सियासतदारों के प्रति क्या औऱ कैसे सोचती है। फ़र्क़ इसका पड़ता है। यह जानते हुए भी सियासतदां अगर सियासी फ़ायदे के फ़ेर में जनता के प्रति अपने उत्तरदायित्व औऱ फ़र्ज़ से मुकर जाते हैं। तो यह जनमत का सौ फ़ीसद निरादर है। कई दफ़ा इस राजनीतिक निरादर का बदला अवाम अपने तरीक़े से लेती भी है। तब राजनीतिक दल को इसका खामियाजा भी उठाना पड़ता है। जो एक बार बाबूसिंह कुशवाहा को भाजपा में शामिल होने पर भारतीय जनता पार्टी को भी उठाना पड़ा था। भले आज के सियासतदां राजनीति राजधर्म औऱ अपने पुरोधा के विचारों को भूल रहें, लेकिन जनता को दरकिनार कर सिर्फ़ सत्ता पर गिद्ध दृष्टि जमाना ठीक नहीं। यह सियासतदानों को समझना होगा।

परिचय - महेश तिवारी

मैं पेशे से एक स्वतंत्र लेखक हूँ मेरे लेख देश के प्रतिष्ठित अखबारों में छपते रहते हैं। लेखन- समसामयिक विषयों के साथ अन्य सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर संपर्क सूत्र--9457560896