मक्कू को सबक

शरारती और चटोरा मक्कू चूहा इधर-उधर खाने की तलाश में फिर रहा था। उसे मिर्च-मसालेदार और दूध से बनी चीजें बहुत पसंद आती थीं। तभी पनीर की लुभावनी गंध उसकी नाक में घुसी और वह उसको खोजने के लिए बेचैन हो उठा। एक कमरे से दूसरे कमरे में घूमते-फिरते अंततः उसको वो डिब्बा दिख ही गया जिससे महक आ रही थी। उसने आव देखा न ताव, सीधे घुसा और वहाँ लटक रहे पनीर के टुकड़े को दाँतों से दबाकर जोर से खींचा। अचानक “ठक्क” की एक आवाज पीछे से आयी और डिब्बे का दरवाजा बंद हो गया। मक्कू का तो अब डर के मारे बुरा हाल था। पनीर मिलने की सारी खुशी नौ-दो ग्यारह हो चुकी थी। जिस चूहेदानी से बचने की सीख मम्मी-पापा रोज देते थे, आज उसी ने फँसा ही लिया। “हाय-हाय इस चटोरी जीभ ने आखिर पकड़वा ही दिया मुझे” कहता मक्कू रो पड़ा। उसने नाखूनों और दाँतों से खींच, नोच के दरवाजा खोलने का बहुत प्रयास किया लेकिन सब व्यर्थ रहा।

इधर उसके बिल में उसकी मम्मी चिंतित हो रही थी कि न जाने ये मक्कू किधर रह गया, अबतक आया क्यों नहीं? पापा ने थोड़ी देर धीरज बँधाया लेकिन मन उनका भी बेचैन हो उठा था सो दोनों उसकी टोह में निकल पड़े। जब वे उस कमरे के पास पहुँचे तो उन्हें मक्कू के रोने की आवाजें सुनायी दीं। वे जल्दी से अंदर आये और चूहेदानी देख कर सब समझ गये। झाँक के देखा तो मक्कू उसी में सिसकता मिल भी गया। मम्मी तो और जोरों से रोने लगी “हे भगवान, अब मेरे बच्चे का न जाने क्या होगा! कहीं ये मनुष्य उसको मार तो नहीं देंगे?”। पापा को भी जब कोई उपाय न सूझा तो वे भाग के अपने बड़े भाई लक्कू चूहे को बुला लाये। लक्कू दौड़ा-दौड़ा वहाँ पहुँचा। उसे देखते ही मक्कू कातर भाव से बोला “ताऊजी, मुझे बचा लीजिए”। वह बहुत सहमा हुआ था।

लक्कू अपने भतीजे मक्कू से बहुत प्यार करता था। उसने मक्कू के मम्मी-पापा को ढाढस बँधाया “देखो ऐसे रोने-घबराने से काम नहीं चलने वाला, मैं कुछ सोचता हूँ”। कह के उसने नजरें चारों ओर दौड़ायी। तभी उसे चूहेदानी के पास रखे टेबल पर एक स्टेबलाइजर नजर आया। उसने मक्कू के मम्मी-पापा को कानों में कुछ कहा और फिर तीनों टेबल पर चढ़ के स्टेबलाइजर को नीचे की ओर धक्का देने लगे। थोड़ी ही देर में स्टेबलाइजर नीचे गिर पड़ा और सीधे चूहेदानी के दरवाजे को खोलने वाले हैंडल से जाकर लगा जिससे वह खुल गया। मक्कू हड़बड़ा के उससे निकला और अपने घर भागा। कोई भारी चीज गिरने की आवाज से उस घर की मालकिन भागती उधर आयी “ओहह बाबा, इतनी जोर से क्या गिरा? कहाँ गिरा?” लेकिन तब तक पूरी चूहा पार्टी फुर्र हो चुकी थी। मक्कू के पीछे मम्मी-पापा और ताऊ लक्कू भी बिल में वापस पहुँचे। सबने मक्कू को गले से लगा लिया। “अब कभी ऐसे किसी खाने-पीने की चीज का लालच मत करना” मम्मी ने उसे प्यार से सहलाते हुए कहा। “नहीं करुँगा मम्मी, कभी नहीं करुँगा” रोते हुए मक्कू को लालच का सबक मिल चुका था (समाप्त)

परिचय - कुमार गौरव अजीतेन्दु

शिक्षा - स्नातक, कार्यक्षेत्र - स्वतंत्र लेखन, साहित्य लिखने-पढने में रुचि, एक एकल हाइकु संकलन "मुक्त उड़ान", चार संयुक्त कविता संकलन "पावनी, त्रिसुगंधि, काव्यशाला व काव्यसुगंध" तथा एक संयुक्त लघुकथा संकलन "सृजन सागर" प्रकाशित, इसके अलावा नियमित रूप से विभिन्न प्रिंट और अंतरजाल पत्र-पत्रिकाओंपर रचनाओं का प्रकाशन