आलेख– आज़ादी के सोपान और आज का परिवेश

हम प्रति वर्ष आज़ादी दिवस मानते हैं। मनाएं भी क्यों न, इसके लिए हमारे पुरखों- पुरोधाओं ने अमिट बलिदान और सर्वस्व न्योछावर जो किया है। पर क्या थे, उनके मस्तिष्क में आज़ादी का भावार्थः, क्या हम आज उसकी अनुभूति कर पा रहें हैं। क्या हमने उनके सपनों को पर लगाया। उन्होंने हमें स्वच्छन्द और विस्तृत आकाश दिया। तो सिर्फ़ इस लिए नहीं। जहां हम स्व की सोच में ही हर छड़ धूनी रमाए रहें। हमारे आलेख की शुरुआती पंक्तियों से आप सभी को आभास हो रहा होगा, कि इसने इस लेख में भी कमियों का पुराण खोलकर बैठ गया हूँ। तो सच है, यहाँ चर्चा उन कमियों की ही होगी, जिसे हमने आज़ादी के इतने लंबे अंतराल के बाद भी कम नहीं कर पाएं हैं। बल्कि उसे बढ़ाने का कार्य किया है। तो हम यहाँ चर्चा एक दिनी जश्न की नहीं करने वाले। हम यहाँ बात उन बिंदुओं के इर्दगिर्द करने वाले। जिसकी वज़ह से न अखण्ड भारत का निर्माण हो पा रहा, और न महापुरुषों के सपनों को सच में हमारा देश तब्दील कर पा रहा। यहां एक बात का ज़िक्र करें, तो स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छन्दता होता है। इसी स्वच्छन्दता का ज़िक्र जैसे होता है। फिर सवालों की लंबी फेहरिस्त गढ़नी शुरू हो जाती है। माना आज़ादी का भावार्थ स्वच्छन्दता है। तो क्या इसका मतलब न्याय, क़ानून और संविधान को ताक पर रख दिया जाएगा। जैसा वर्तमान दौर में भीड़तंत्र के साथ कभी कभार सियासतदां भी जिसकी झलक पेश करते रहते हैं।

आज़ादी के सोपान और आज का परिवेश:-
अगर 15 अगस्त 1947 के ऐतिहासिक दिन देश आजाद हुआ था। तो इस आजादी को पाने के लिए भारत के लाखों वीर सपूतों ने अपनी कुर्बानी दी थी। उस पर चंद लोग ही राज नहीं कर सकते। आज भारत को आजादी मिले सात दशक से ज़्यादा वक्त हो चुके हैं। देश में काफी कुछ बदल चुका है, और बदल भी रहा है। देश विकास की अंधी दौड़ में रमा हुआ भी है। देश परमाणु शक्ति से संपन्न और महाशक्ति बनने की राह पर अग्रसर है। भारतीय वैज्ञानिकों ने दुनिया के देशों के सामने अंतरिक्ष में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा लिया है। हम चांद-मंगल भी फ़तह कर लिए हैं। फिर भी आज देश के सामने प्रत्यक्ष रूप से ऐसे अनगिनत सवाल ख़ड़े हैं, जो हमें सोचने पर मजबूर कर देते हैं, कि हम किस आज़ादी का ढिंढोरा पीट रहें? जब देश आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे पर ही लहूलुहान हो जाता है। क्षेत्रवाद और भाषा के नाम पर हम एक देश के होकर भी बंटे हुए हैं। युवाओं को अपने आज़ाद देश के प्रति कर्तव्यों का ज्ञान नहीं रहा है। तो वहीं बहुतेरे प्रश्न मुँह बनाकर हमें चिढ़ा भी रहें, कि तुम कैसी आज़ादी मना रहे, जब सामाजिक और राजनीतिक कुरीतियों और बुराइयों से अलग आज़तक नहीं हो सकें। कुछ प्रश्न हैं, जो हमें जब भी आज़ादी की बातें हमारे कानों तक पहुँचती है, तो वे अंदर से कुरेदने लगते हैं। कैसी आज़ादी पर हम गुमान किए जा रहें। जब हम भ्रष्ट आचरण से देश को आजाद करा नहीं सकें। अंतिम पंक्ति के व्यक्ति तक योजनाओं को पहुँचा नहीं सके। देश में महिलाओं को तमाम प्रकार के प्रतिबंधों से मुक्ति दिला नहीं सके। धर्म और जाति का जकड़न और जंजीरें हम झंझावात लाकर तोड़ नहीं पाए। इसके साथ अगर आज़ादी के सात दशक बाद भी किसान और मजदूर पूंजीवाद की जकड़ से स्वतंत्रता महसूस कर नहीं पाए। फिर कैसी आज़ादी का ढोल हम पीट रहें। गांधी ने तो यह सपना कभी नहीं देखा होगा, कि आने वाले वक्त में भी हमारा सपनों का भारत छुआ-छूत और उच्च और निम्न श्रेणी के अधर में पिसता रहें। विवेकानंद ने कभी न सोचा होगा, कि हमारे देश की आने वाली पीढ़ी नशे में आकंठ डूब जाएं। पर शायद आज की व्यवस्था को इन सब बातों का जरा भी फ़र्क नहीं पड़ता। आज के वक़्त सत्ता के लिए खुला खेल चल रहा। नैतिकता, सामाजिक कर्तव्यों को दरकिनार कर दिया है राजनीति ने। तो ऐसे में हम कुछ ऐसे बिंदुओं को केंद्र में रखेंगे। जिससे देश को छुटकारा दिलाकर, कुछ ऐसे बिंदु भी होंगें। जिस पर अमल करके हम सच्चे अर्थों में स्वतंत्रता यानि स्वच्छन्दता का एहसास कर सकते हैं।

देश का निर्माण तो चंद अंगुलियों पर गिने जा सकने वाले व्यक्तियों से होता नहीं। देश बनता है प्रदेश के समूह से। प्रदेश किससे बनता है, जिलों, तहसीलों आदि से। वह जिला कैसे निर्मित होता है। वहाँ पर रहने वाले व्यक्तियों के समूहों से। ऐसे में जब तक हर व्यक्ति के हाथ में समान संवैधानिक अधिकार के अंतर्गत सुविधाएं न पहुँच जाएं। तो फिर हम कैसी स्वतंत्रता का ढोल पीट रहें। इतना ही नहीं सिर्फ़ अधिकार मिल जाने से ही स्वतंत्रता मान लिया गया। फिर स्थिति और दयनीय और विकट हो जाएगी। समाज के लोगों के कुछ कर्तव्य और उत्तरदायित्व भी हैं। उसका अनुसरण अगर हुआ। तभी सच्ची आज़ादी की रसानुभूति सभी को हो सकती है। हमारे महापुरुषों ने आज़ादी के वक्त एकजुटता दिखाई। तब हम खुले आकाश के तले बिना किसी दवाब के आहार-विहार कर रहें। तो उन्होंने एक ऐसे भारत का सपना भी संजोया था, कि जहाँ जाति-धर्म के नाम पर उन्माद न हो। शोषण-उत्पीड़न का कमोबेश कोई स्थान न रहे। अपराध से भारतीय समाज मुक्त हो, देश ओछी और अवसरवादी राजनीति के चंगुल से आज़ाद हो। धर्मनिरपेक्ष समाज बने। तो इन सभी बिंदुओं पर आज भी अगर हम उलझे हुए हैं। साथ में भ्रष्टाचार जैसा जिन्न भी विकराल रूप ले चुका है, समाज में ईमानदारी की जगह बेईमानी ने ले ली है। फिर कहाँ और किससे आज़ाद हुए हैं हम। क्या हमने सिर्फ़ अंग्रेजों की गुलामी से निज़ात को ही आज़ादी का मापक समझ लिया है। तो यह कदापि उचित नहीं होगा, क्योंकि आज की स्थिति ऐसी हो रही। जहाँ स्थितियां अंग्रेजों के वक्त से भी बद्दतर होती जा रही। ऐसे में हम और हमारा देश किस आज़ादी के लिए एक दिन की खुशियां मानता फिर रहा है।

हम हर स्तर पर बंटे हुए , फिर कहाँ और कैसी आज़ादी:-
उत्तर-पूर्व से लेकर जम्मू कश्मीर और छत्तीसगढ़ से लेकर पश्चिम बंगाल तक अलगाववाद का भाव प्रदर्शित हो रहा वर्तमान समय में। यह अलगाव खान-पान का न होकर अखंड भारत के निर्माण में बाधक हैं। फिर कैसी आज़ादी का पाठ हम पढ़ रहे, जहां अपने ही अलग-अलग स्वर में गा रहें हैं। कहीं माओवादी बंदूक कंधे पर रखकर लोकशाही व्यवस्था को चुनौती दे रहें। तो कहीं अपने लोग ही बहकावें में आकर अपनों के खिलाफ ही ज़हर उगलने के साथ पत्थरबाज़ी कर रहें। ये बातें यह बताती हैं, कि देश आंतरिक स्तर पर काफ़ी बड़ी समस्याओं से दो-चार हो रहा। लोकतांत्रिक व्यवस्था को अगर चुनौती देते हुए माओवादी यह कहते हुए पाए जाते हैं, कि वे बंदूक की नोक के बल पर दिल्ली की गद्दी 2050 तक प्राप्त कर लेंगे। तो क्या यहीं सपना देखा था हमारे वीर सपूतों ने कि हमारा देश अंदुरुनी स्तर पर ही जंग का मैदान बन जाएं। देश का कोई भी कोना हो, आज वह अत्याचार, अलगाव, हिंसा और अन्य जकड़नों में उलझा पड़ा है। फिर ऐसे में समझ नहीं आता हम कैसे भारत का निर्माण करने में लगे हैं। जब हम छोटे-छोटे मुद्दों पर बंटते जा रहें, फिर कहाँ रह जाती है हमारी भारतीयता। कहाँ शेष रह जाता है, स्वतंत्रता का भान। जब हम हर मुद्दें पर आपस में ही लड़ रहे, फिर कैसे बनेगा महापुरुषों के विचारों का भारत। कैसे वापस आ पाएगा हमारा भारतीय गौरव। कैसे हम विश्वगुरु बन पाएंगे और कैसे विश्व की महाशक्तियों का नेतृत्व कर पाएंगे?

कहीं आज़ादी चंद हाथों तक सिमट कर तो नहीं रह गई :-
आजादी मिलने से पहले आजादी का जो ‘अर्थ’ था। शायद आज की व्यवस्था और हमने उसके अर्थ को परिवर्तित कर दिया है। राजनीतिक रूप से भले तत्कालीन दौर में हम सभी भारतवासी प्रतिवर्ष 15 अगस्त को आजादी की वर्षगांठ मनाते हैं। पर आए दिन देश की आज़ादी के भावार्थ में तब्दीली होती जा रही। जो काफ़ी चिंताजनक स्थिति प्रदर्शित कर रही। आज सबने अपने-अपने ढंग से आजादी का मतलब निकालना शुरू कर दिया है। अमीर व्यक्ति और अमीर हो जाने को आज़ादी समझ बैठा है। गरीब आदमी के लिए आजादी का अर्थ गरीबी से आजादी है। अशिक्षित व्यक्ति के लिए आजादी का अर्थ अशिक्षा से आजादी है। युवाओं के लिए आज़ादी किसी का कोई दवाब उसके जीवन पर न हो। यह हो गया है। ऐसे ही सभी वर्गों और व्यक्तियों के लिए आजादी के अलग-अलग मायने है। ऐसे में लगता यहीं है एकता और अखंडता का कोई मोल देशवासियों के दिलों-दिमाग मे नहीं रह गया है। सब अपने-अपने हितों के लिए आज़ादी को अपने ढंग से परिभाषित करने में लगे हैं, फिर ऐसा तो संगठित होकर अंग्रेजों का मुकाबला करने वाले देश के सपूतों ने यह कभी न सोचा होगा, कि एक दिन सब सिर्फ़ अपनी आजादी के लिए मर-मिटने के लिए तैयार हो जाएंगे। आज के दौर में भुखमरी से आज़ादी, बेकारी से आज़ादी, महंगाई से आज़ादी, भ्रष्टाचार से आजादी, कुव्यवस्थाओं से आज़ादी अनिवार्य हो गया है। हमारे देश में कुपोषण के डंक से पीड़ित बच्चें हैं। राजनीति धर्म और जाति के बेड़ियों में समाज को बांधकर रखना चाहती है। महिलाओं को आज भी समाज में वह हक नहीं मिला पाया। जिसका ज़िक्र संविधान करता है। कुव्यवस्थाओं का विद्रूप चेहरा आज भी हमारे समाज को डरा रहा है। हम विज्ञान के दौर में धर्म, जाति और मज़हब के नाम पर आपस में ही लड़ रहे। तो फिर हम कहाँ आज़ाद हुए। आज हमें सिर्फ़ अपनी आजादी का ख्याल है। पर अपनी आजादी के फ़िक्र में कितनों की स्वतंत्रता का हनन कर रहें। यह सोच नहीं पा रहें। तो ऐसे समाज की परिकल्पना तो उन शहीदों के मन में न रहीं होगी, जो शूली पर हंसते-हंसते हमारी खुशियों और स्वच्छन्दता के लिए चढ़ गए थे। आज़ादी दिलाने में किसी एक वर्ग विशेष का योगदान नहीं था, और न एक वर्ग विशेष से ही सभ्य समाज और राष्ट्र का निर्माण होता है। यह हमें और हमारे रहनुमा तंत्र को समझना चाहिए। इसके तत्पश्चात हमें ग़रीबी से आज़ादी चाहिए, भुखमरी से आज़ादी चाहिए, कुव्यवस्थाओं से स्वतंत्रता चाहिए, कुरीतियों से आज़ादी चाहिए। नीतियों की जद में समाज का अंतिम व्यक्ति आना चाहिए। तब जाकर हम असलियत में कहीं स्वतन्त्र राष्ट्र कहलाने के सच्चे अधिकारी बन पाएंगे।

युवा और स्वतंत्रता:-
युवावस्था जिंदगी का एक ऐसा पड़ाव होता है जहां उसे स्वतंत्रता की महती आवश्यकता की अनुभूति होती है। आज के आधुनिक होते दौर में आज़ादी यूँ कहें तो अपने असल मक़सद को भूल कर अन्य तरीक़े के मक्कड़जाल में उलझती जा रहीं।
आज हमारे पास विचारों के आदान- प्रदान से लेकर तकनीक, शिक्षा, संसाधन, विज्ञान, परिधान हर तरह की आजादी है। पर ऐसे में युवाओं के लिए क्या है स्वतंत्रता के मायने? यह पता होना आवश्यक है। कुछ लोगों के विचार हो सकते हैं, कि व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में व्यस्त युवाओं के लिए आज़ादी का मकसद सिर्फ़ फेसबुक और सोशल साइट्स पर मैसेज पोस्ट करना और आज़ादी के नाम पर हुड़दंग आदि मचाना है। यह कुछ हद तक सच भी है। पर एक सच्चाई इससे इतर भी है, युवाओं की आज़ादी को लेकर। उसे भी हमें देखना चाहिए। युवाओं का देश भारत है। तो यहां के युवा आज़ादी का सच्चा अर्थ भी अब भलीभांति समझने लगें हैं। तभी तो वे आजादी और अधिकारों का इस्तेमाल नये भारत के निर्माण के लिए कर रहें हैं। जिसका सबूत 2011 का अन्ना आंदोलन हो, या 2014 में भ्रष्टाचार में संलिप्त पार्टी से बेदखल करना हो। यह सब युवाओं की सोच की वजह से ही सम्भव हो सका। आज का युवा कुरीतियों की जंज़ीरों को खंड-खंड विखंडित करने में लगा हुआ है। साथ में हमारा युवा समाज जाति-पात की बनी-बनाई लकीरों को मिटाकर एक नए आयाम को स्थापित करने वाले समाज निर्माण की तरफ़ बढ़ रहा। तभी तो वह अंतरजातीय विवाह आदि घर-परिवार और समाज के विरुद्ध जाकर कर रहा। हां पर वह अपने अधिकारों के आड़ में ज़्यादा ही स्वतन्त्र आकाश की परिकल्पना कभी- कभार कर बैठता है। तब वह नशे की लत में ट्रैफीक नियमों को विखंडित करता है। अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर अनर्गल प्रलाप चालू कर देता है। जो सही नहीं कहा जा सकता। ऐसे में आज अगर जरूरत है, तो युवाओ को सिर्फ़ अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में उचित ज्ञान देने की। उसके बाद हमारी युवा पीढ़ी इतनी समझदार है, जो अपने देश और समाज का हित-अहित समझती है।

आज़ाद नागरिक होने का फ़र्ज़ अदा करें:-
आज़ादी इसलिए तो मिली नहीं, कि हम सिर्फ़ अपने अधिकारों के झंडाबरदार बनें रहें। अगर हम स्वच्छन्दता के आकाश में गोते लगाना चाहते हैं। तो हमारे कुछ कर्तव्य भी हैं। उसका बोध भी हमें होना चाहिए। स्वतंत्रता हमें हमारे वीर सपूतों ने इसलिए दिलाई। जिससे हम अपना सम्पूर्ण विकास कर सकें। हमारे साथ किसी भी स्तर पर कोई भेदभाव न हो सके। तो इसके लिए हमारे संविधान में नागरिक अधिकारों की लंबी फेहरिस्त बनाई गई है। भले ही वह आज़ादी के सात दशक बाद भी समाज के अंतिम पंक्ति में बैठे व्यक्ति के समूह तक न पहुँची हो। पर आज़ादी का अर्थ यही आकर ख़त्म नहीं हो जाता। स्वतंत्रता का भाव परिपूर्ण तब होता है, हम अपनी जिम्मेदरियों और कर्तव्यों के प्रति भी वफादार हो। अगर हम सिर्फ़ अपनी स्वच्छन्दता को ही देखते रहेंगे। तो फिर उन लोगों का क्या होगा, जो आज भी पिछड़े हुए हैं। जिन्हें वो अधिकार नहीं मिल सकें। जो उन्हें प्राप्त होना चाहिए। तो जब तक हम अपने देश, समाज घर-परिवार के प्रति अपने फ़र्ज़ और कर्तव्यपरायणता का मोल अदा नहीं करते। तब तक आज़ादी का सही सोपान नहीं उभरता। हम जब तक अपने कर्मों को प्रधानता नहीं दे सकते। तब तक देश भक्त होने का ढोंग करने का कोई सकारात्मक असर नहीं दिखने वाला। हर किसी के पास राष्ट्र के लिए कुछ न कुछ कर गुजरने की क्षमता होती है। उसे पूरा किए बिना हम राष्ट्र भक्त कहलाने के हक़दार नहीं बन सकते। आज स्वतन्त्र देश की विडम्बना तो देखिए अधिकारों के प्रति लोग जागरूक तो हैं, कि हमें आज़ाद नागरिक होने के लिहाज़ से फलां चीजें करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। पर वे उन कर्तव्यों के प्रति प्रखर और मुखर दिखाई नहीं पड़ते। जिनका ज़िक्र संविधान में तो है ही, साथ मे जो एक स्वतंत्र देश की उन्नतिशीलता में सहभागिता निभा सकता है।

पुनश्च:-
अगर सच में हम अपने देश को विश्व गुरु बनते देखना चाहते है। क्रांतिकारी वीर सपूतों के सपनों के भारत को बनाना है, तो अपने राह से विमुक्त होती युवा शक्ति को सही दिशा देनी होगी। भ्रष्टाचार, भुखमरी और बेईमानी से देश को आजाद कराना होगा। आंतरिक मुद्दों हो रही कलह पर लगाम लगानी होगी। सियासतदानों को सिर्फ़ सत्ता की खातिर देश की अवाम में जाति-धर्म की नफरती बीज बोने से बाज़ आना होगा। नीले और हरे में बांटने की सियासी परिपाटी को बंद करना होगा। साथ में अधिकारों के साथ जब कर्तव्यों और जिम्मेदरियों का समन्वय स्थापित होगा। तब जाकर सच्ची स्वतंत्रता की अलख जलती दिखाई देगी, और भारत एक अखंड राष्ट्र बनने के साथ विश्वगुरु बनने की राह प्रशस्त कर पाएगा।

परिचय - महेश तिवारी

मैं पेशे से एक स्वतंत्र लेखक हूँ मेरे लेख देश के प्रतिष्ठित अखबारों में छपते रहते हैं। लेखन- समसामयिक विषयों के साथ अन्य सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर संपर्क सूत्र--9457560896