मुझे तो माँ गंगा ने बुलाया है

न तो मुझे किसी ने यहाँ भेजा है, नहीं मैं खुद चलकर यहाँ आया हूँ, मुझे तो माँ गंगा ने बुलाया है. यह पंक्तियाँ प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने बनारस से सांसद के चुनाव के लिए नामांकन के पहले बड़े ही भावुक अंदाज में कही थी. श्री मोदी ने गंगा सफाई अभियान के लिए कई योजनाओं का प्रारंभ किया. काशी में गंगा-घाट की सफाई के लिए खुद कुदाल भी चलाया. काफी लोगों को गंगा की सफाई से जोड़ा, नमामि गंगे उनकी महत्वाकांक्षी परियोजना है. इसके लिए स्वतंत्र मंत्रालय भी बनाया. पहले यह स्वतंत्र प्रभार उमा भारती के जिम्मे था पर उनकी देख-रेख में शायद ज्यादा प्रगति न होता देखकर ही इस मंत्रालय को गडकरी जी के जिम्मे कर दिया. गडकरी जी अभी हाल ही में बयान दे चुके हैं कि मार्च २०१९ तक गंगा ७०% साफ़ हो जायेगी. देखा जाय वह दिन भी ज्यादा दूर नहीं है. पर गंगा की सफाई, अविरलता, निर्मलता के लिए कितने ही संत महापुरुष हवन करते रहे और कितनों ने स्वयं की आहुति तक दे डाली इससे हम सभी वाकिफ है.

अभी ताजा समाचार 86 वर्षीय प्रो. जी डी अग्रवाल यानी स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद का है जो गंगा की सफाई की मांग को लेकर गत 22 जून से हरिद्वार में गंगा किनारे स्थित मातृ-सदन में अनशन कर रहे थे. उन्होंने अपने निधन से पहले ही वसीयत कर दी थी कि उनका पार्थिव शरीर ऋषिकेश स्थित एम्स के शरीर विज्ञान विभाग को सौंप दिया जाए. गंगा को बचाने के लिए जान देने वाले स्वामी ज्ञानस्वरूप हाल के वर्षों में दूसरे पर्यावरण प्रेमी संन्यासी हैं. इससे पहले 2011 में 13 जून को ११५ दिन तक अनशन करते हुए स्वामी निगमानंद ने भी इसी तरह हरिद्वार में अनशन करते हुए अपनी जान दे दी थी.

प्रो. जीडी अग्रवाल (स्वामी सानंद) अपने जीते जी गंगा को साफ-सुथरा होता देखने की चाह रखने वाले पिछले 111 दिनों से अनशन पर थे. इस दौरान उन्होंने सरकार को कई दफे पत्र लिखा और चाहा की गंगा की सफाई के नाम पर नारेबाजी-भाषणबाजी के अलावा कुछ ठोस हो, लेकिन सरकारों का रवैया जस का तस रहा. वह पूर्ववर्ती सरकारों में भी अनशन पर बैठे थे और तब भी उनकी यही मांग थी और इस बार जब वे अनशन पर बैठे तब केंद्र में ‘गाय और गंगा’ की बात करने वाली सरकार थी, ऐसे में इस मसले को और संवेदनशीलता से देखने और निपटने की जरूरत थी लेकिन हुआ क्या…! न तो गंगा में गिरने वाली गंदगी पर लगाम लग पाई है और न ही अवैध खनन रुका है.
हम सभी जानते हैं कि केदारनाथ की भयानक आपदा में हज़ारों जानें गई थीं. उसके बाद तमाम वैज्ञानिकों ने इस आपदा का अध्ययन किया और लगभग सभी रिपोर्ट में गंगा का जिक्र था और कहा गया कि गंगा को बचाने के लिए तत्काल ठोस कदम उठाए जाने चाहिए, नहीं तो ऐसी आपदाओं को रोका नहीं जा सकता. 2014 में वन और पर्यावरण मंत्रालय ने खुद सुप्रीम कोर्ट में एक रिपोर्ट सौंपी और स्वीकार किया कि हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट की वजह से केदारनाथ आपदा ने और विकराल रूप धारण किया. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को गंगा नदी के बेसिन में बन रहे बांधों पर रोक लगाने की जरूरत भी बताई. 2016 में इसी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया और कहा कि बांधों की वजह से गंगा को जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई संभव नहीं है.  जब २०१४ में श्री नरेंद्र मोदी नीत भाजपा की सरकार बनी तो गंगा की सफाई और स्वच्छता को लेकर जोर शोर से बात हुई. दावे तो यहां तक किए गए कि गंगा साफ नहीं हुई तो जान दे दूंगी. लेकिन वास्तव में गंगा कितनी साफ हुई यह प्रोफेसर अग्रवाल से बेहतर कौन बता सकता था !

गंगा से जुड़ी धार्मिकता सिर्फ दूसरों को ललकारने के काम आती है. गंगा के कोई काम नहीं आती है. इसीलिए कहा उन्होंने कहा कि श्रद्धा अपनी जगह मगर वो गंगा के लिए नहीं है. गंगा के नाम पर ख़ुद के लिए है. प्रो. जी डी अग्रवाल के साथी तो उनके जाने के बाद गंगा के लिए लड़ते रहेंगे मगर समाज जो दावा करता है कि वह गंगा से है, उनके बीच जी डी अग्रवाल की मौत एक मामूली ख़बर भी नहीं है. मातृसदन का आरोप है कि प्रो. अग्रवाल की हत्या हुई है. संदिग्ध मौत हुई है. लेकिन प्रो. अग्रवाल के परिजनों ने कहा कि उन्हें इस तरह का शक नहीं है. प्रो. अग्रवाल ने बर्कले के यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया से पीएचडी की थी. आईआईटी कानपुर में पढ़ाया था. 2011 में वे स्वामी सानंद हो गए थे. 22 जून से गंगा के लिए उपवास पर बैठे थे. उनके पत्रों से पता चलता है कि सरकार से उनका संपर्क था और सरकार भी उनके संपर्क में थी, फिर ये स्थिति क्यों आई.
प्रो. अग्रवाल ने प्रधानमंत्री को अंतिम उपवास के दौरान तीन पत्र लिखे थे. वे प्रधानमंत्री से उम्र में बड़े होने के नाते उन्हें ‘तुम’ कह कर संबोधित करते थे. 24 फरवरी और 13 जून को पत्र लिखकर बता दिया था कि गंगा को लेकर उनकी मांगे नहीं मानी गईं तो वे 22 जून से उपवास पर बैठेंगे और प्राण त्याग देंगे. 23 जून को भी एक पत्र लिखा. उसके बाद एक अंतिम पत्र लिखा 6 अगस्त 2018 को. 24 फरवरी को प्रधानमंत्री को जो पत्र लिखा उसमें तो जिस तरह से लिखा है वो प्रो. जी डी अग्रवाल जैसा ही शख्स लिख सकता है. वो लिखते हैं, ‘2014 के लोक-सभा चुनाव तक तो तुम भी स्वयं मां गंगाजी के समझदार, लाडले और मां के प्रति समर्पित बेटा होने की बात करते थे पर वह चुनाव मां के आशीर्वाद और प्रभु राम की कृपा से जीतकर अब तो तुम मां के ही कुछ लालची, विलासिताप्रिय बेटे-बेटियों के समूह में फंस गए हो और उन नालायकों की विलासिता के साधन जुटाने के लिए जिसे तुम लोग विकास कहते हो, कभी जल मार्ग के नाम से बूढ़ी मां को बोझा ढोने वाला खच्चर बना डालने चाहते हो, कभी ऊर्जा की आवश्यकता पूरी करने किए हल का, गाड़ी का या कोल्हू जैसी मशीनों का बैल. डॉ. अग्रवाल के अनुसार
3.08.2018 को केंद्रीय मंत्री साध्वी उमा भारती जी उनसे मिलने आई थीं. उन्होंने फोन पर नितिन गडकरी जी से बात कराई. लेकिन प्रतिक्रिया की उम्मीद आपसे है, इसलिए मैंने सुश्री उमा भारती जी को कोई जवाब नहीं दिया. मेरा यह अनुरोध है कि आप निम्नलिखित चार वांछित आवश्यकताओं को स्वीकार करें, दो मेरे 13 जून को आपको लिखे पत्र में सूचीबद्ध हैं. यदि आप असफल रहे तो मैं अनशन जारी रखते हुए अपना जीवन त्याग दूंगा.
मुझे अपनी जान दे देने में कोई चिन्ता नहीं है क्योंकि गंगाजी का काम मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण है. मैं आईआईटी का प्रोफेसर रहा हूं तथा मैं केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड एवं गंगाजी से जुड़ी सरकारी संस्थाओं में रहा हूं. उसी के आधार पर कह सकता हूं कि आपकी सरकार ने इन चार सालों में कोई भी सार्थक प्रयत्न गंगाजी को बचाने की दिशा में नहीं किया है.’ वे प्रधानमंत्री को साफ-साफ लिखते रहे कि गंगा को लेकर उनकी तमाम नीतियां कारपोरेट को फायदा पहुंचाने के लिए है. ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री प्रो. जी डी अग्रवाल को नहीं जानते थे. उन्होंने भी प्रो. जी डी अग्रवाल के निधन पर शोक जताया है. ट्वीट किया है. प्रधानमंत्री ने 2012 में भी एक ट्वीट किया था, तब भी जी डी अग्रवाल अनशन पर थे और केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी. १९ मार्च २०१२ के इस ट्विट में प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा था, स्वामी सानंद के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूं, जो अविरल, निर्मल गंगा को लेकर अनशन पर हैं. उम्मीद है केंद्र सरकार गंगा को बचाने के लिए ठोस कदम उठाएगी. अफसोस कि विपक्ष में रहते हुए जिस स्वामी के स्वास्थ्य की कामना करते थे, जब मोदी सत्ता में आए तो स्वामी सानंद यानी प्रो. जी डी अग्रवाल 111 दिनों के अनशन पर बैठे और उनकी मौत हो गई. लेकिन जिन्हें गंगा की चिन्ता थी वो फिर प्रधानमंत्री से सवाल करने लगे हैं कि गंगा कहां है? आखिर एक पर्यावरणविद को प्रधानमंत्री मोदी से उम्मीद क्यों नहीं होती? मई 2015 में प्रधानमंत्री ने नमामी गंगे प्रोजेक्ट की घोषणा की. गंगा मंत्रालय बनाया. 6 साल के लिए 20,000 करोड़ का बजट बनाया. प्रो. अग्रवाल को प्रधानमंत्री मोदी के बनाए प्रोजेक्ट से आपत्ति थी. उन्हें लगता था कि ये सब कोरपोरेट के लिए है. सीएजी ने दिसंबर 2017 में नमामि गंगे को लेकर एक रिपोर्ट दी थी जिसमें कहा था, ‘हमने 87 प्रोजेक्ट के सैंपल की जांच की थी. इनमें से 50, 1 अप्रैल 2014 के बाद लांच हुए थे. इन सभी के लिए 7,992.34 करोड़ रुपये की मंज़ूरी दी गई थी. 2014-15 से 2016-17 के दौरान 2,615 करोड़ फंड का इस्तमाल ही नहीं हुआ. किसी प्रोजेक्ट में 8 प्रतिशत ही फंड इस्तमाल हुआ तो किसी में अधिक से अधिक 63 प्रतिशत.'(आंकड़े अंतर्जाल से साभार)
प्रोफेसर अग्रवाल माँ गंगा की गोद में समा गए. सरकार और सिस्टम की संवेदनहीनता ने एक संस्था और ईमानदार प्रयास को निगल लिया. पर उम्मीद की जानी चाहिए कि उनका यह बलिदान बेकार नहीं जायेगा और ‘गंगापुत्र’ गंगा को साफ़ करने में कोई कसर न छोड़ेंगे …हम सब को भी यथासंभव गंगा को साफ़ करने और साफ़ रखने में मदद करनी चाहिए. टाटा स्टील द्वारा प्रायोजित श्रीमति बचेंद्री पाल के नेतृत्व में ‘नमामि गंगे’ का एक दल गंगा सफाई अभियान में जुड़ा है. यह टीम ने गंगा की सफाई के अलावा लोगों को प्रेरित करने का भी काम कर रही है…. जय गंगा मैया!

जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर