कदमों के अपने निशां छोड़ जाएं

आओ कुछ ऐसा कर जाएं
कदमों के अपने निशां छोड़ जाएं

मानव जीवन मिला अनमोल
सेवा में समर्पित हो जाएं
होठों पे मुस्कान किसी के
बहते अश्कों को पोंछ जाएं
आओ कुछ ऐसा कर जाएं
कदमों के अपने निशां छोड़ जाएं

नन्हीं कलियों के सपनों को
उम्मीदों का जहाँ दे जाएं
युवाओं को आगे बढ़ना है
हौसलों की उड़ान दे जाएं
आओ कुछ ऐसा कर जाएं
कदमों के अपने निशां छोड़ जाएं

बने जो राह कांटों भरी
आशाओं का गुलिस्तां बनाएं
दृढ़ संकल्प की धार बहा दें
हवाओं का रुख मोड़ जायें
आओ कुछ ऐसा कर जाएं
कदमों के अपने निशां छोड़ जाएं

धन दौलत का क्या है मोल
तन भी मिट्टी में मिल जाना
दी जो धरोहर मातृभूमि ने
उसको भी तो कर्ज़ चुकाएँ

रचें इतिहास खुदी का ऐसा
जहाँ में रोशन नाम कर जाएं

आओ कुछ ऐसा कर जाएं
कदमों के अपने निशां छोड़ जाएं

परिचय - हर्षा मूलचंदानी

पति - श्री कन्‍हैया मूलचंदानी स्‍थायी पता - भोपाल, मध्‍यप्रदेश मातृभाषा - सिन्‍धी लेखन - सिन्‍धी, हिन्‍दी, गुजराती नौकरी - मध्‍यप्रदेश शासन, विधि मंत्रालय, भोपाल लेखन विधा - तुकांत, अतुकांत, मुक्‍तक, नज्‍़म, गज़ल, दोहा, गीत सम्प्रति - स्वतंत्र लेखन , राष्ट्रीय पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित , राष्ट्रीय स्‍तर पर मंचो पर काव्यपाठ,सेमिनार में पेपर पढना एवं साहित्यिक कार्यशालाओं में उपस्थिति , मंच संचालन , आकाशवाणी भोपाल से प्रसारित साप्‍ताहिक सिन्‍धी कार्यक्रम में कम्‍पीयर