ये कैसी आजादी ?

 

आज 26 जनवरी है । हमारा देश 70 वां गणतंत्र दिवस हर्षोल्लाष से मना रहा है । आजादी तो हमें 15 अगस्त 1947 को ही यानी आज से लगभग 72 साल पहले ही मिल चुकी है । आजादी के बाद बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की अगुआई में बैरिस्टरों के एक समूह ने अथक प्रयास करके देश के सभी वर्गों ,जातियों धर्मों व समूहों के साथ न्याय करने के लिए भारतीय संविधान की संरचना की जो आज हमारे देश के लोकतंत्र का सबसे बड़ा ग्रंथ है । संविधान में सभी वर्गों के साथ सही न्याय किये जाने की अवधारणा को अमली जामा पहनाते हुए दस साल के लिए समाज के दबे कुचले व पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण की विशेष व्यवस्था की गई । इस व्यवस्था के तहत आरक्षित वर्ग के लोगों को नौकरीयों में आरक्षण का लाभ मिलने लगा । 1954 में अश्पृश्यता कानून लागू किये जाने के बाद सवर्णों की नाराजगी के बावजूद धीरे धीरे समाज के इन दोनों वर्गों के बीच स्थित गहरी खाई समाप्त होने लगी । शिक्षा के प्रचार व प्रसार ने जनमानस के विचारों को पूरी तरह प्रभावित किया । असमानता की इस खाई को पाटने का सभी ने यथाशक्ति प्रयास किया । लेकिन आजादी के इतने वर्षों बाद भी यदि हम अपने आसपास नजर डालें तो बहुत सी ऐसी विसंगतियाँ नजर आती हैं जिन्हें देखकर मन में यह सवाल जरूर उठता है ..क्या यही आजादी के मायने हैं ? ‘ आइये ! कुछ उदाहरणों से आजादी के मायने समझने का प्रयास करें ।
हमारे संविधान ने हमें अभिव्यक्ति की आजादी दी है । इसी आजादी के तहत हम अपने देश के शीर्ष पद पर आसीन व्यक्ति के बारे में भी अपना स्वतंत्र विचार प्रकट कर सकते हैं । शालीनता के दायरे में टीका टिप्पणी भी कर सकते हैं । लेकिन जब अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश विरोधी गतिविधि को आप क्या कहेंगे ? पिछले दिनों जे एन यू प्रकरण खासा चर्चा में रहा । हालाँकि अभी इस में लगाये आरोपों पर विवाद जारी है लेकिन यदि आरोप सत्य साबित हुए तो यह घोर निंदनीय है । अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर इस तरह की आजादी नहीं दी जा सकती । इसी प्रकरण को लेकर खुद को देशभक्त होने का प्रमाणपत्र देनेवाली सत्ताधारी पार्टी के ग्यारह सदस्य मध्यप्रदेश से देशविरोधी गतिविधियों में लिप्त होने के आरोप में पकड़े गए । यह भी घोर निंदनीय है । नैतिकता राजनीति में बची ही नहीं और यह बहुत ही दुःखद है कि हमारे देश की राजनीति दिनों दिन अनैतिकता के नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है ।
शिक्षा के प्रचार प्रसार की वजह से लोगों में जागरूकता बढ़ रही है । लोग अपने अधिकारों के प्रति सजग हो रहे हैं । महिला सशक्तिकरण की बयार भी अपने अनोखे अंदाज में आगे बढ़ रही है । इसके सकारात्मक परिणाम भी नजर आ रहे हैं जो स्वागतयोग्य है । आज हमारे देश की महिलाएं हर क्षेत्र में अग्रणी हैं । देश का कोई भी कीर्तिमान उनसे अछूता नहीं है । बहुत बढ़िया लगता है जब हम इन सब पर नजर डालते हैं लेकिन जब आधुनिकता के नाम पर महिलाओं के फूहड़ अंगप्रदर्शन को देखते हैं तो मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ये कैसी आजादी ?
दूरदराज के गांवों में आजादी के 72 वर्षों बाद भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव देखकर बरबस ही मुख से निकल पड़ता है ये कैसी आजादी ?
देश का पेट भरनेवाला किसान भूखे रहता है । गगनचुम्बी इमारतों का निर्माण करनेवाला मजदूर एक अदद झोंपड़े से आगे की सोच भी नहीं सकता । ये कैसी व्यवस्था बना दी है हमने ?
शादियों , जलसों व उत्सवों में फिजूलखर्ची करने वाले लोग यह देखकर भी संवेदनशून्य ही रहते हैं कि उनके छोड़े गए जूठे भोजन के लिए इंसानों और जानवरों में भी जंग होती है कभी कभी । अनावश्यक दिखावे पर दिल खोलकर खर्च करनेवाले महानुभाव जब किसी जरूरतमंद की मदद करनी हो तो बगलें झाँकने लगते हैं । नतीजा अमीरी और गरीबी के बीच खाई और गहरी होती जा रही है । ऐसी व्यवस्था बना दी गई है कि अमीर और अमीर , गरीब और गरीब होता रहे , असमानता की खाई और बढ़ती रहे । यह सब देखकर क्या यह सवाल नहीं उठता कि ये कैसी आजादी ?
सामाजिक तानेबाने का विस्तृत अध्ययन किये बिना अंग्रेजों द्वारा बनाई गई शासन प्रणाली ज्यों का त्यों अपना लिया गया । सवालिया निशान इस पर भी खड़ा होता है । अंग्रेजों की बाँटो और राज करो की झलक हमारी संसदीय प्रणाली में साफ दिखाई पड़ती है । यही वजह है कि देश पर राज करनेवाली किसी भी पार्टी को 47 फीसदी से अधिक वोट नहीं मिले अर्थात 53 फीसदी लोगों के विरोध के बावजूद उस दल को शासन करने का अधिकार मिला जिसे मात्र 47 फीसदी लोगों ने पसंद किया था ।  सरकार के कामकाज पर टीका टिप्पणी करनेेे वालों को तुरंत देशद्रोही का तमगा दे देनेवाली पार्टी के समर्थकों का व्यवहार भी यह सवाल खड़े करता है , ये कैसी आजादी ?
किसान जब भूख व कर्ज से परेशान होकर आत्महत्या करता है तब बरबस ही सवाल उठता है ये कैसी आजादी ? अभी पिछले दिनों ही उड़ीसा में एक छोटी सी बच्ची भूख भूख कहकर दम तोड़ देती है और उसकी माँ को सरकारी राशन इसलिए नहीं मिला क्योंकि उसके पास आधार कार्ड नहीं था । इंसानी जिंदगियों पर हावी नियमों को देखकर भी सवाल उठता है , ये कैसी आजादी ?
सरकारी दफ्तरों में मामूली से कार्य के लिए भी अनावश्यक धक्के और मुट्ठी गर्म करने वाकये नजर आते रहते हैं । अभी पिछले दिनों एक महिला का वीडियो काफी चर्चा का विषय बना रहा जिसमें कोई मुहल्ले का छुटभैया नेता राशन कार्ड बनाने के नाम पर उस महिला का यौन शोषण करता दिख रहा है । एक भारतीय महिला को भारतीयता के प्रमाणपत्र के लिए इस हद तक समझौता करना पड़े तो सवाल उठता है कि ये कैसी आजादी ? जिसमें सामान्य प्रमाणपत्र भी सामान्य लोगों के लिए असामान्य बना दिये गए हैं जिसका नतीजा होती हैं ऐसी घटनाएं या फिर दलालों और बिचौलियों के नए साम्राज्य व तंत्र का फलना व फूलना ।
दूरदराज के गांवों में आज भी स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं का अभाव एक बार फिर यही सवाल खड़े करती है ।
सवालों की फेहरिस्त बहुत लंबी है । यदि आपके मन में भी ऐसे कोई सवाल उठते हैं तो प्रतिक्रिया में साझा कीजिये । धन्यवाद !

परिचय - राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।