2019 आम चुनाव: कौन कितने पानी में

सत्रहवीं लोक सभा के गठन के लिए आम चुनाव 2019 का विगुल बज चुका है, देशभर में 11 अप्रैल से 19 मई के बीच 7 चरणों में मतदान होंगे। और चुनाव परिणाम 23 मई को आएगा। आम चुनाव की इस घोषणा के साथ ही सभी राजनैतिक पार्टियां अपने-अपने स्तर पर चुनाव की तैयारियों में जुट गईं हैं। और सभी दंभ भर रहीं हैं कि आनेवाले चुनाव में सरकार गठन का मेंडेट उन्हीं को मिलने जा रहा है। पर वास्तव में राजनैतिक पार्टियों के भीतरखाने चल रही उठापटक को देखकर उनकी हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है। चुनाव की हलचल ने सभी नेताओं और राजनैतिक पार्टियों के अंदर भी हलचल पैदा कर दी है। तभी कोई चौकीदार बना फिर रहा है तो कोई महंगी गाड़ियों में बैठकर खुदको बेरोजगार बता रहा है। तो कभी
‘यूपी को ये साथ पसंद है’ का नारा बुलंद करनेवाले राहुल-अखिलेश की जोड़ी टूट गई है और अखिलेश ने अब राहुल से प्रयाप्त दूरी बना ली है। कभी कांग्रेस को गाली देनेवाले और कांग्रेस की नीतियों के विरुद्ध आम आदमी पार्टी का गठन करनेवाले केजरीवाल अब गठबंधन के लिए कांग्रेस के पीछे हाथ धोकर पड़े हुए हैं और कांग्रेस हरबार उन्हें झिड़क रही है। देश की राजनीति में इस चुनाव सबकुछ अजब-गजब हो रहा है और सभी पार्टियां किसी भी कीमत पर सत्ता सुख भोगने को आतुर हैं। भले ही इसके लिए उन्हें अपनी विचारधारा की तिलांजलि ही क्यों न देनी पड़े।

भाजपा कितनी तैयार:
आम चुनाव की तैयारियों के बीच सत्तासीन पार्टी भाजपा सबसे अधिक सक्रिय नजर आ रही है। ‘फिर एक बार,मोदी सरकार’ के नारों के साथ पार्टी पूरे दमखम के साथ चुनाव में उतर रही है। पार्टी मोदी सरकार की उपलब्धियों को मुद्दा बनाकर चुनाव जीतने के सपने देख रही है। तो साथ ही पुलवामा में हुए आतंकी हमले के जवाब में सरहद पार जैश के अड्डों पर की गई एयर स्ट्राइक को भी भुनाने में लगी है। पाकिस्तान में बालाकोट के आतंकी अड्डों पर हुए हवाई हमले (Balakot IAF Air Strike) के बाद देश में जो माहौल बना है बीजेपी उसका पूरा फायदा लेने की कोशिश में जुटी है। 2019 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर पार्टी नए प्लान पर काम रही है। पार्टी अब चुनाव प्रचार में सिर्फ विकास को ही नहीं, बल्कि ‘राष्ट्रवाद’ को भी मुख्य मुद्दा बनाने की में जुटी है। ‘मोदी है तो मुमकिन है’ के टैग लाइन में मोदी के अन्य सफल योजनाओं के साथ ही ‘बालाकोट हमले’ को भी शामिल किया जा रहा है।

मोदी सरकार द्वारा किसानों के (जिनके पास दो हेक्‍टेयर से कम ज़मीन है उनके) खाते में 6,000 रुपये प्रतिवर्ष जमा कराने की घोषणा के साथ-साथ असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों को प्रतिमाह 1,000 रुपये तथा 15,000 रुपये तक की सैलरी वाले को 3,000 रुपये प्रतिमाह पेंशन, EPFO में बीमा सीमा छह लाख रुपये, करमुक्त ग्रेच्‍युटी की सीमा 10 लाख से बढ़ाकर 20 लाख रुपये किये जाने की घोषणा को भूनाकर पार्टी किसान और मजदूरों को अपने पाले में करने की कोशिशों में लगी हुई है।

मोदी सरकार द्वारा मध्यवित्त परिवारों के लिए आरंभ किये गए ‘हाउसिंग फॉर ऑल’ स्कीम, ‘आयुष्‍मान भारत’ योजना को आधार बनाकर भारतीय जनता पार्टी मध्यवित्त मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने की जुगत में लगी हुई है। वहीं ‘वन रैंक, वन पेंशन’, ‘सर्जिकल स्ट्राइक’, ‘एयर स्ट्राइक’ आदि को आधार बनाकर पार्टी पूर्व सैनिकों और जवानों के परिवारवालों को साधने में लगी हुई है। मोदी सरकार की एक महत्‍वाकांक्षी योजना ‘उज्‍ज्‍वला योजना’ के तहत बांटे गए फ्री एलपीजी कनेक्शन का भी लाभ पार्टी को इस चुनाव में हो सकता है। तो मोदी सरकार के सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक अगड़ी जातियों को ‘आर्थिक आधार पर आरक्षण’ दिए जाने के फैसले को भी इस चुनाव मुद्दा बनाकर भाजपा अपने पारंपरिक वोटबैंक को अपने साथ जोड़े रखने की कोशिश में जुटी हुई है।

मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में देखने को मिली है, जिसे आधार बनाकर भाजपा अपने विकासकार्य के नारों को बुलंद करने में जुटी है। अगर आंकड़ों पर यकीन करें तो वर्ष 2014-17 के दौरान मोदी सरकार द्वारा कुल 34,103 किमी राजमार्ग और 18,704 किमी सड़क का निर्माण किया गया है। जम्मू में सबसे लंबे रोड टनल का निर्माण,असम में ब्रह्मपुत्र नद पर बने 9.15 किलोमीटर लंबे(भारत के सबसे लंबे पुल) धोला सादिया सेतु तथा बोगीबिल ब्रीज का निर्माण,छोटे शहरों को वायु संपर्क से जाेड़ने के लिए उड़ान स्कीम का कार्यान्वयन, जिसके तहत लगभग 56 एयरपोर्ट और 31 हैलिपेडों का निर्माण। साथ ही देश की आजादी के सत्तर साल बाद पूर्वोत्तर के सभी राज्यों तक ट्रेन पहुंचाने के लक्ष्य के साथ 5,158 किमी रेलमार्ग का विस्तार जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर के कार्यों का मुद्दा भी सरकार के विकास के दावों को मजबूती प्रदान करेगी।

मोदी एंड पार्टी देश हित में पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन के मुद्दे को भी अपने चुनाव प्रचार का हिस्सा बना रही है। सोशल मीडिया पर सक्रिय भाजपा के साइबर सेल के धुरंधरों ने सरकार के पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन को सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर प्रोजेक्ट करना शुरू कर दिया है।

सोशल मीडिया की सक्रियता को देखे तो भाजपा पूरी तैयारी के साथ अपने विकास और राष्ट्रवाद दोनों ही एजेंडों को लेकर चल रही है। पार्टी के पास सरकार की कई उपलब्धियां हैं जिन्हें मुद्दा बनाकर वह फिर से सत्ता पाने की पुरजोर कोशिश कर रही है। पर अंतिम निर्णय जनता जनार्दन को लेना है, जो उसके दावों को कितना महत्व देगी अभी कह पाना मुश्किल है।

कांग्रेस के वादों का पिटारा:
चुनाव की तैयारियों में जुटी कांग्रेस भी जनता को रिझाने के लिए कई तरह से कोशिश कर रही है। हाल ही में संपन्न हुए मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव परिणामों से अतिउत्साहित पार्टी ने लोकसभा चुनावों को लेकर भी कई तरह के वादें करने शुरू कर दिये हैं। हाल ही में चुनावी जनसभाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने न्यूनतम आय गारंटी, कृषि ऋण माफी, रोजगार देने संबंधित कई वादें किये। कांग्रेस अध्यक्ष ने किसानों को रिझाने के लिए सरकार गठन के दस दिनों के भीतर सभी किसानों के कृषि ऋण माफ करने का वादा किया है। राहुल ने युवा वोटरों को लुभाने के लिए उन्हें न्यूनतम आय गारंटी का लॉलीपॉप दिखाया है। उन्होंने युवाओं से वादा किया है कि कांग्रेस की सरकार बनते ही वे ग़रीबों के खाते में 6,000 रुपये प्रतिमाह जमा कराएंगे। अर्थात देश के हर ग़रीब व्यक्ति के बैंक अकाउंट में कांग्रेस सरकार न्यूनतम आमदनी देगी। जिससे देश में न कोई भूखा रहेगा, न कोई ग़रीब रहेगा। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जीएसटी के सुधार को लेकर भी वादे किये और उन्होंने पांच विभिन्न करों के साथ जटिल जीएसटी प्रणाली लागू करने के लिए बीजेपी की आलोचना की। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सत्ता में आने के बाद जीएसटी में सुधार करेगी और इसे एकल कर प्रणाली बनाएगी। कांग्रेस के पास फिलहाल मोदी सरकार पर हमले के लिए कोई पुख्ता मुद्दा नहीं है। वह बस सांप्रदायिकता, सीबीआई के दुरुपयोग और रफाल डील में हुए कथित भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर बीजेपी पर हमले कर रही है। फिलहाल कांग्रेस के पास कोई भी ऐसा मुद्दा नहीं है जिससे वह मोदी सरकार को घेर सके और सरकार गठन के लिए प्रयाप्त नम्बर जुटा सके। संभवतः यही कारण है कि पार्टी गैरजरूरी मुद्दों पर चर्चा की जगह लोकसभा चुनाव को आर्थिक मुद्दों पर लड़ने पर बल दे रही है, जिसमें न्यूनतम आय गारंटी, कृषि ऋण माफी, रोजगार, नोटबंदी और जीएसटी को गलत तरह से लागू करने जैसे मुद्दे शामिल हैं।

महागठबंधन का विश्लेषण:
बात अगर महागठबंधन की करें तो महागठबंधन के भीतरखाने भी सबकुछ सही नहीं चल रहा है। क्योंकि बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन कर उत्तर प्रदेश की 80 में से 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही है। यहां दोनों पार्टियों ने बस रायबरेली और अमेठी सीटों को कांग्रेस के लिए छोड़ने की घोषणा की है जबकि अन्य दो सीटों को सहयोगी पार्टियों के लिए छोड़ा है। सपा-बसपा के इस रूख से तथा कांग्रेस के यूपी में अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा से विपक्ष के महागठबंधन पर सवाल खड़ा हो गया है।

बात अगर महागठबंधन में शामिल आम आदमी पार्टी की करें तो कांग्रेस ने उसे झटक दिया है। आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने चुनावपूर्व दिल्ली और हरियाणा में कांग्रेस के साथ गठबंधन करने को लेकर अनेक प्रयत्न किये पर उन्हें हरबार मुंहकी खानी पड़ी और कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी से किसी भी तरह के गठबंधन से इंकार कर दिया। कांग्रेस के इस बर्ताव के बाद आम आदमी पार्टी चिढ़ी हुई है और वह कांग्रेस पर बीजेपी से मिलीभगत का आरोप लगा रही है। वैसे आम आदमी पार्टी की इस छटपटाहट से उसके गिरते ग्राफ की झलक साफ दिख रही है। आम आदमी पार्टी गठबंधन को लेकर जिस कदर बेकरार नजर आ रही है उससे साफ नजर आता है कि उसकी हालत बहुत सही नहीं है। वैसे भी अरविंद केजरीवाल ने अब तक दिल्ली में सीसीटीवी कैमरे नहीं लगवाएं हैं, और नाहीं फ्री वाईफाई, मुफ्त बिजली-पानी तथा लोकायुक्त नियुक्त करने के अपने वादे को ही पूरा किया है। केजरीवाल की इस वादा खिलाफी के कारण दिल्ली के नागरिकों में आम आदमी पार्टी को लेकर खासा गुस्सा है। वैसे इस लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के मुद्दे पर चुनाव लड़ना चाहती है। अब आप के इस मुद्दे को दिल्ली की जनता किस नजरिये से देखती है इसका पता चुनाव के बाद ही साफ हो पायेगा।

बिहार में महागठबंधन का नेतृत्व तेजस्वी यादव कर रहे हैं और वो जाति का गणित लेकर चल रहे हैं। आरजेडी का माय यानी मुस्लिम यादव समीकरण अटूट माना जाता है। यह समीकरण 90 के दशक से ही हिट रहा है और लालू को सत्तासीन करने में इसकी बड़ी भूमिका रही है। हालांकि धार्मिक ध्रुवीकरण और राष्ट्रवाद के चुनावी मुद्दा बनने की शक्ल में इस समीकरण के दरकने का डर है। वैसे भी बीजेपी इस चुनाव राष्ट्रवाद को मुख्य मुद्दा बनाकर चुनाव जीतने की तैयारी में है। और बताया जा रहा है कि भारतीय सेना की एयर स्ट्राइक बाद बिहार के कई स्थानों में दिवाली जैसा माहौल था और शहरों में राष्ट्रवादी नारे लगाए गए थे। टीवी और इंटरनेट पर प्रसारित होने वाली सामग्री से बिहार के चुनाव में जातीय समीकरणों का ताना-बाना टूटने के भी आसार हैं, जिसका असर बिहार के चुनाव में दिखेगा। ऐसे में तेजस्वी यादव का गणित फीका पड़ सकता है। साथ ही कहा जा रहा है कि बिहार में बीजेपी और जेडीयू के ख़िलाफ़ विपक्षी पार्टियों का कुनबा इतना बड़ा हो गया कि यही अब उनकी सबसे बड़ी समस्या बन गया है और महागठबंधन में सीटों के बँटवारे को लेकर पेच फंस गया है। महागठबंधन में इस बार वैसी पार्टियों को भी जगह दी गई है जो एक भी सीट जीत पाने का मादा नहीं रखती है। सीपीआई और सीपीआईएमएल उन्हीं में से हैं। मुकेश साहनी और जीतन राम मांझी भी इस मामले में नए खिलाड़ी ही हैं।

महागठबन्धन की एक और अहम नेता ममता बनर्जी ने भले ही लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी एकता का नेतृत्व करते हुए कांग्रेस के साथ मंच साझा किया हो, लेकिन चुनावी मैदान में वे कांग्रेस के साथ नहीं हैं। ममता बनर्जी पहले ही ऐलान कर चुकी हैं कि वह लोकसभा चुनाव में अकेली चुनाव लड़ेंगी। यानी टीएमसी का कांग्रेस से गठबंधन नहीं होगा। इसलिए यहां भी कांग्रेस बीजेपी के साथ-साथ टीएमसी से भी लड़ेगी।

21 लोकसभा सीटों वाले ओडिशा में भी कांग्रेस पूरी तरह से अकेली है। वहां कांग्रेस के सामने भी दो बड़ी पार्टिया हैं, जिनसे पार पाना इतना आसान नहीं है। ओडिशा के मुख्यमंत्री और बीजद प्रमुख नवीन पटनायक साफ कह चुके हैं कि वह न तो कांग्रेस के साथ जाएंगे और न ही बीजेपी के साथ। वहीं, जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ है। वहां पीडीपी और बीजेपी के अलग होने से थोड़ी राहत कांग्रेस को जरूर मिलेगी।

वैसे महागठबंधन की राह इतनी भी आसान नहीं है। क्योंकि संभावनाओं के इस गठबंधन में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी कई हैं। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक विपक्षी दलों के कई नेता 2019 के लोकसभा चुनावों में विपक्षी गठबंधन की ओर से किसी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए नामित किये जाने के खिलाफ हैं। विपक्ष के कई नेता प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में किसी का नाम घोषित किये जाने के खिलाफ हैं। सपा, तेदेपा, बसपा, तृणमूल और राकांपा सभी स्टालिन द्वारा राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषणा किये जाने से सहमत नहीं है। उन्हें लगता है कि यह जल्दीबाजी है और लोकसभा परिणामों के बाद ही प्रधानमंत्री का निर्णय होगा।

जानकार महागठबंधन को वास्तविक गठबंधन कहने पर भी सवाल खड़ा कर रहें हैं क्योंकि ज़्यादातर राज्यों में ये दल साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि वे बस महागठबंधन का राग अलाप रहें हैं। वास्तव में यह महागठबंधन बस उन क्षेत्रीय दलों का एक समूह है जो 2019 में बीजेपी को बहुमत न मिलने की हालत में साझा सरकार बनाने की जुगत में है, यानी अगर कोई गठबंधन हुआ तो वो चुनाव नतीजे आने के बाद ही होगा।

महागठबंधन का राग अलापने वाली अधिकतर पार्टियों की मनोस्थिति से साफ पता चलता है कि वे ‘जिसकी जितनी ताकत, सत्ता में उसकी उतनी हिस्सेदारी’ के हिसाब से आम चुनाव के नतीजे आने के बाद बीजेपी विरोधी सरकार बनाने की कोशिश करेंगी, और यही वजह है कि अधिकतर पार्टियां मिलकर लड़ने के लिए तैयार नहीं है। रही बात सीट बंटवारे की तो कोई भी पार्टी कम सीटों पर चुनाव लड़ने को तैयार नहीं है। हालांकि ध्यान देने वाली बात यह भी है कि गठबंधन चुनाव के बाद भी हो सकता है। चुनाव के बाद पार्टियों को मिले सीटों के आधार पर वे गठबंधन से जुड़ा आखिरी फैसला करने के पक्ष में है।

वैसे अब सभी राजनैतिक पार्टियां अपने-अपने स्तर पर आम चुनाव के लिए कमर कस चुकी हैं। पर आखिरी फैसला अब भी जनता जनार्दन को ही करना है। ताबड़तोड़ रैलियों और वादों के बीच अब जनता को ही फैसला करना है कि उसे किसके साथ जाना है और अगले पांच वर्षों के लिए सत्ता की चाबी वह किसे सौंपेगी। ऐसे में जनता को साधने के लिए सभी राजनैतिक पार्टियों द्वारा किये जा रहे हथकंडों का हिसाब अब 23 मई को ही होगा और उसी दिन पता चलेगा कि जनता ने किसके वादों पर अपना भरोसा जताया है और किसे पुनर विचार का संकेत दिया है।

-मुकेश सिंह
सिलापथार,असम।

परिचय - मुकेश सिंह

परिचय: अपनी पसंद को लेखनी बनाने वाले मुकेश सिंह असम के सिलापथार में बसे हुए हैंl आपका जन्म १९८८ में हुआ हैl शिक्षा स्नातक(राजनीति विज्ञान) है और अब तक विभिन्न राष्ट्रीय-प्रादेशिक पत्र-पत्रिकाओं में अस्सी से अधिक कविताएं व अनेक लेख प्रकाशित हुए हैंl तीन ई-बुक्स भी प्रकाशित हुई हैं। आप अलग-अलग मुद्दों पर कलम चलाते रहते हैंl