बुझा बुझा जीवन है

बुझा बुझा जीवन है
शायद अपना
आशा निराशा है
मन में
कटु जटिलता पनपती है
संघर्ष भरे दौर है
दीप जलते बुझते है
उगती है
कठिनाई हर मोड़ पर
राह पर
मुसीबत ढपली बजाती है।
क्या करूँ?
क्या न करूँ?
मुझे लगता है
सब बेबाक, व्यर्थ
सपनों सा
अंधकार सा
इसलिए यूँही बैठ जाता हूँ
हारा थका सा
मुँह सिले
घर अपने।

परिचय - अशोक बाबू माहौर

जन्म -10 /01 /1985 साहित्य लेखन -हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं में संलग्न प्रकाशित साहित्य-विभिन्न पत्रिकाओं जैसे -स्वर्गविभा ,अनहदकृति ,सहित्यकुंज ,हिंदीकुंज ,साहित्य शिल्पी ,पुरवाई ,रचनाकार ,पूर्वाभास,वेबदुनिया आदि पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित I साहित्य सम्मान -इ पत्रिका अनहदकृति की ओर से विशेष मान्यता सम्मान २०१४-१५ से अलंकृति I अभिरुचि -साहित्य लेखन ,किताबें पढ़ना संपर्क-ग्राम-कदमन का पुरा, तहसील-अम्बाह ,जिला-मुरैना (म.प्र.)476111 ईमेल- ashokbabu.mahour@gmail.com 9584414669 ,8802706980