कहानी

कहानी – ना तेरी ख़ता ना मेरी ख़ता

यह ज़िंदगी काफ़ी उलझनों का ताना-बाना लिए हमें विवशता के भंवर में डुबो देती है। जिससे उबरने में वक़्त लगता है। हैदराबाद की सबसे बड़ी शायरा गुलअफ्शां, यास्मीन की बचपन की सहेली, एक दूसरे के सुख दुख में हमेशा शामिल रहने वाली, लेकिन यास्मीन की शादी के बाद उसका शौहर सद्दाम अपनी मर्दाना वजाहतों के चलते गुलअफ्शां की नज़रों में बस गया और उसकी नीयत में खोट आ गयी।

दोनों सहेलियों के दरमियान एक दिन बातों बातों में बात चल निकली –
गुलअफ्शां – क़िस्मत वालों को ही मिलता है सद्दाम जैसा हैंडसम शौहर। बिल्कुल सलमान ख़ान लगता है।
यास्मीन – नज़र मत लगाओ मेरे सद्दाम को। वो हैंडसम के साथ साथ वफ़ादार भी है।
गुलअफ्शां – हुं–ह – – मर्द और वफ़ादार – – नामुमकिन।
यास्मीन – आज़मा कर देख लो।
गुलअफ्शां – सोच लो, बाद में पछताना ना पड़े !
यास्मीन – मुझे अपनी मुहब्बत और अपने शौहर पर पूरा भरोसा है।

बहरहाल इंसान तो गुनाह का पुतला है और अगर इंसान गुनाह ना करे तो फरिश्ता ना बन जाए। सिर्फ़ एक महीने के प्रयास में सद्दाम, गुलअफ्शां के झांसे में आ गया और यास्मीन के भरोसे को तोड़ बैठा। चंद लम्हों के जज़्बाती सुख ने ज़िंदगी भर के चैन को उससे छीन लिया।
राज़ तो फ़ाश होना ही था। फिर क्या था, यास्मीन और सद्दाम की ज़िन्दगी में तूफ़ान आ गया।

बात कोर्ट तक जा पहुंची और फिर एक दिन – – तलाक़ हो गया।

एक वक़्त था जब सद्दाम और यास्मीन एक दूसरे के बिना  पल भर भी रहना गवारा नही करते थे। फिर, दोनों हालात के भंवर में यूं उलझे कि डूबने के कगार तक जा पहुंचे। कोर्ट से यास्मीन और सद्दाम दोनों अलग अलग गाड़ियों से घर पहुंचे। सद्दाम सोफे पर पसरते हुए यास्मीन से बोला “ले लो, जो कुछ भी चाहिए, मैं रोकूंगा नहीं।”

यास्मीन ने ग़ौर से सद्दाम को देखा। दो सालों में कितना बदल गया था वो। बालों में सफेदी झांकने लगी थी। शरीर पहले से आधा रह गया था। चेहरे की रौनक ग़ायब हो चुकी थी और हालात के निशान चेहरे पर साफ़ झलक रहे थे।

कमरे में दाख़िल होते ही पुरानी यादें ताज़ा हो गईं। कितनी मेहनत से सजाया था इस कमरे को यास्मीन ने, एक एक चीज़ में उसकी जान बसी थी। सब कुछ उसकी आँखों के सामने बना था। एक एक ईंट से बनते घरौंदे को पूरा होते देखा था उसने। कितनी शिद्दत से सद्दाम ने उसके सपने को पूरा किया था।

कमरे की ख़ामोशी सद्दाम के आवाज़ से टूटी – क्या सोचने लगीं, ये लो अपने हक़ के पांच लाख का चेक और समेटो अपने सारे सामान।

यास्मीन ने चेक और अपना सामान लिया, सद्दाम के समान को छुवा भी नही। फिर यास्मीन ने सद्दाम को गहनों से भरा बैग लौटाया।
सद्दाम ने बैग वापस देते हुए कहा – ” ये भी रखलो, तुम्हारे लिए ख़रीदा था, अब मेरे किस काम के।”

यास्मीन ने कहा – “क्यूँ ? कोर्ट में तो तुम्हरा वकील गहने-गहने चिल्ला रहा था।”
सद्दाम ने कहा – “कोर्ट की बात कोर्ट में ही ख़त्म हो गई, वहाँ तो तुमने भी मुझे दुनिया का सबसे बड़ा अय्याश मर्द कहा था।” इतना कह कर सद्दाम ने मुंह फेर लिया और दूसरे कमरे में चला गया। शायद आंखों में कुछ उमड़ आया था जिसे छुपाना ज़रूरी था। यास्मीन का मन भी सद्दाम के पीछे चलने को मजबूर हो गया।

वो अंदर जाकर बच्चों की तरह रो रहा था। जैसे भीतर के सैलाब को दबाने की जद्दोजेहद कर रहा हो। पीछे से यास्मीन ने सद्दाम के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा – “इतनी मुहब्बत थी तो क्यों दिया तलाक़ ?”

सद्दाम – “मैंने नही तलाक़ तुमने दिया।”
यास्मीन – “माफ़ी नही माँग सकते थे ?”
सद्दाम – “मौक़ा कब दिया तुमने। जब भी फोन किया, काट देती थीं।”
यास्मीन – “घर भी आ सकते थे।”
सद्दाम – “हिम्मत नही थी मुझमें।”

ख़ुद को पिघलने से रोकने के लिए यास्मीन कमरे से बाहर निकल आई। उसके भीतर भी कुछ टूट फूट रहा था। दिल बैठा जा रहा था। लॉन में बेतरतीब घास फूस उग आए थे जिन्हें देखकर उसने सोचा ‘कैसा आदमी है, ख़ुद से नही होता तो मज़दूरों से सफ़ाई करा लेता’ फिर उसने सर झटकते हुए कहा ‘मेरी बला से, मुझे क्या’

कुछ देर बाद जब बाहर भी घबराहट होने लगी तो वो फिर अंदर चली गई। सद्दाम बेड पर उल्टे मुंह पड़ा सिसक रहा था। यास्मीन ने सरसरी नज़र से कमरे को देखा। अस्त व्यस्त हो गया था पूरा कमरा। कहीं कहीं तो मकड़ी के  जाले झूल रहे थे। लग रहा था महीनों से इस कमरे की सफ़ाई नही हुई थी।

यास्मीन की आहट पाकर अचानक सद्दाम बिस्तर से उठा और यास्मीन के सामने घुटनों के बल बैठते हुए बोला – ” मत जाओ,,, यास्मीन,,, मुझे माफ़ कर दो,,, मैं तुम्हारा गुनहगार हूं ”
शायद यही वो अल्फ़ाज़ थे जिन्हें सुनने के लिए दो साल से तड़प रही थी यास्मीन। सब्र के सारे बांध टूट गए। दोनों एक दूसरे से लिपट कर रोने लगे।
बहुत देर तक रोते रहने के बाद जब अंदर के सारे ग़ुबार बाहर निकल आए और तूफ़ान शांत हो गया, तब यास्मीन ने कोर्ट के फैसले का काग़ज़ निकाला और टुकड़े टुकड़े कर फाड़ दिया और बोली ” चलो क़ाज़ी के पास चलते हैं।”
बाहर खड़ी पिकअप वैन का ड्राइवर बार बार हॉर्न बजाकर सामान लादने का संकेत दे रहा था लेकिन अंदर तो मामला पूरी तरह से पलट चुका था।

अब्दुल ग़फ़्फ़ार 

परिचय - अब्दुल ग़फ़्फ़ार

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