बाढ़ की विभीषिका में जीवन दर्शन

सर पर बोझा, कांधे बच्चे, छाती तक है पानी

कैसे – कैसे दिन दिखलाती है ये नदिया रानी ।

इसके पाटों पर कल कोठी
पथ मेंं बंध बनाए ।
करके मैला इसका तल जल
रहें मूढ़ भरमाए ।।

हम करते थे , हमें देख , अब करती है मनमानी
गति अति की बुरी बताती हमको नदिया रानी ।

जिसकी जलधारा में जीवन
लेती थी अंगड़ाई ।
आज उसी के रूप में मृत्यु
घर तक चलकर आई ।।

समय फिरे तो मित्र ही शत्रु जग की रीत पुरानी
सच के कड़वे पाठ पढाती है ये नदिया रानी ।

जिस विपदा में झोपड़ियों के
बंग बिगड़ जाते हैं ।
उसी आपदा से महलों के
रंग निखर जाते हैं ।।

आग जलाती लकड़ी को, सोने को देती पानी
शक्ति की सत्ता समझाती है ये नदिया रानी ।

अपनी सीमा तोड़ नदी जब
तट से गुजर जाती है ।
बड़े जतन से सधी गृहस्थी
पल में उजड़ जाती है ।।

हो सरिता या वनिता, दोनों की यही कहानी
मर्यादा का मान बताती है ये नदिया रानी ।

समर नाथ मिश्र
रायपुर