ऋषि दयानन्द ज्ञान, कर्म व उपासना आदि की दृष्टि से विश्व के शीर्षस्थ महापुरुष हैं

ओ३म्

संसार में अनेक महापुरुष हुए हैं जिनके जीवन में कुछ विशेषायें थी तथा जिसके कारण लोगों ने उन्हें महापुरुष का स्थान दिया। पहली बात तो यह है कि संसार में उत्पन्न जीतने भी लोग हुए हैं वह सब अल्पज्ञ जीवात्मा थे और अपने पूर्वजन्म के शुभाशुभ कर्मों का फल भोगने के लिये परमात्मा द्वारा उत्पन्न किये गये थे। मनुष्य अपने जीवन में अपने चरित्र की रक्षा करते हुए दूसरों के हित व कल्याण के लिए जिन महद् कार्यों को करता है, वह उसे महापुरुष बनाते हैं। ऐसे भी लोग रहे हैं या हो सकते हैं जिनके जीवन में अज्ञान सहित कुछ दुर्बलतायें थीं फिर भी उनका महापुरुष मानकर प्रचार किया गया और वह महापुरुष कहलाते है। संसार के सभी ज्ञात महापुरुषों के गुणों कर्मों पर विचार किया जाये तो विश्व में ऋषि दयानन्द जैसा महापुरुष दूसरा नहीं हुआ। ऋषि दयानन्द के जीवन की अनेक विशेषतायें हैं जो उन्हें संसार का सर्वोत्तम महान् पुरुष मानने के लिये बाध्य करती हैं। उनका पहला गुण तो उनका ईश्वर के अस्तित्व में पूर्ण अनन्त विश्वास था। वह ईश्वर के सत्यस्वरूप को सर्वांगपूर्ण रूप में जानते थे। इसका कारण उनका वेदों का ज्ञान, ऋषियों द्वारा रचित वैदिक साहित्य का ज्ञान, उनका योगाभ्यास और उसके द्वारा ईश्वर व अपनी आत्मा का साक्षात्कार करना था। संसार में बहुत कम लोग हुए हैं जिन्होंने योगाभ्यास करते हुए अष्टांग योग के द्वारा ध्यान समाधि को सिद्ध कर ईश्वर का साक्षात्कार किया हो। संसार में जिन्हें महापुरुष माना जाता है, हमारा अनुमान है कि अपवाद को छोड़कर कोई इस कसौटी पर पूरा नहीं उतरता। ऋषि दयानन्द ही ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्हें ईश्वर के सत्य यथार्थ स्वरूप का ज्ञान था और उन्होंने उसके ही अनुरूप ईश्वर का प्रत्यक्ष वा साक्षात्कार किया था। मुण्डक उपनिषद में ईश्वर साक्षात्कार का उल्लेख मिलता हैं। वहां कहा गया है कि ‘‘भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे पराऽवरे।।” इसका अर्थ है कि जब (योगाभ्यास के आठ अंगों वा साधनों सहित उपासना करते हुए समाधि को प्राप्त होकर ईश्वर का साक्षात्कार हो जाता है तब) इस जीवात्मा के हृदय की अविद्या अज्ञानरूपी गांठ कट जाती है, सब संशय छिन्न हो जाते हैं। दुष्ट कर्म क्षय को प्राप्त होते हैं। तभी उस परमात्मा में जो कि अपनी आत्मा के भीतर और बाहर व्यापक हो रहा है, जीवात्मा उसमें निवास करता वा उसका साक्षात्कार कर सभी दुःखों से मुक्त हो जाता है।

विगत पांच हजार वर्षों में ऋषि दयानन्द वेदों के सबसे बड़े ज्ञाता वेद-मर्मज्ञ विद्वान थे। वह वेदो के संस्कृत हिन्दी भाषा के भाष्यकार भी थे। उन्होंने ऋग्वेद के अधिकांश भाग सहित सम्पूर्ण यजुर्वेद का भाष्य किया है। यदि उनको विष देकर मार डाला गया होता तो वह कुछ वर्षों में चारों वेदों का पूर्ण वेदभाष्य कर जाते जो सृष्टि के आरम्भ से अब तक के वेदभाष्यों में सर्वोत्तम होता। उन्होंने जो भाष्य किया है वह सर्वोत्तम अपूर्व ही है। यही एक गुण उनको विश्व के महापुरुषों का शिखर बनाने में पर्याप्त कारण है। ऋषि दयानन्द ने वेदों का भाष्य किया, उसका प्रचार किया तथा ईश्वर के सत्य गुण, कर्म व स्वभाव से विश्व के मनुष्यों को अवगत कराया, यह उनकी बहुत बड़ी देन है। ईश्वर की उपासना कैसे की जाती है, इसको भी लोग भूल चुके थे। ऋषि दयानन्द ने उपासना की विधि ‘‘सन्ध्या” की भी पुस्तक भी लिखी है जो वेदमन्त्रों से विभूषित है ओर प्रत्येक मन्त्र का संस्कृत और हिन्दी भाषा में अर्थ उसमें दिया गया है। सन्ध्या का उद्देश्य भी ईश्वर की कृपा को प्राप्त होने सहित धर्म, अर्थ, काम मोक्ष की प्राप्ति है जो कि केवल वेदाध्ययन कर ईश्वर आत्मा को जानकर वैदिक विधि के अनुसार उपासना सद्कर्मों को करने से ही प्राप्त होते हैं। इसके अतिरिक्त भी अन्य अनेक कारण हैं जिनसे ऋषि दयानन्द को विश्व का सर्वोत्कृष्ट महापुरुष सिद्ध किया जा सकता है।

ऋषि दयानन्द ने सत्य के प्रचार, असत्य के खण्डन व असत्य को दूर करने के लिये ‘‘सत्यार्थप्रकाश” ग्रन्थ लिखा है। इतना ही नहीं अपितु मनुष्य की सभी जिज्ञासाओं को ध्यान में रखकर उन सबका समाधान भी ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में वेदप्रमाण, तर्क व युक्तियों एवं ऋषियों के ग्रन्थों के आप्त वचनों के आधार पर किया है। सत्यार्थप्रकाश में ऋषि दयानन्द ने वेदोत्पत्ति पर भी प्रकाश डाला है। सृष्टि के इतिहास की भी चर्चा कर उन्होंने अनेक तथ्यों को उजागर किया है। ईश्वर सहित जड़ चेतन देवताओं के अन्तर को बताया है। ईश्वर के सौ से कुछ अधिक नामों की व्याख्या भी की है और बताया है कि सभी नामों का विशेष्य एक सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा ही है। सत्यार्थप्रकाश ऐसा ग्रन्थ है जिसका अध्ययन कर मनुष्य अविद्या से दूर होकर असत्य व पाखण्डों को छोड़कर सत्यस्वरूप, ज्ञानस्वरूप, प्रकाशस्वरूप, आनन्दस्वरूप, विज्ञानस्वरूप, सृष्टि के उत्पत्तिकर्ता, पालनकर्ता तथा प्रलयकर्ता ईश्वर में निवास करता है तथा ईश्वर में विचरण करने एवं ध्यानावस्थित होकर आत्मा के लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त होता है। सत्यार्थप्रकाश के अतिरिक्त ऋषि दयानन्द ने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, पंचमहायज्ञविधि, व्यवहारभानु, गोकरूणानिधि सहित वेदभाष्य की भी रचना की हैं। यह सभी ग्रन्थ मनुष्य की अविद्या को समूल नष्ट करने में समर्थ हैं। ऐसे ग्रन्थ जिनसे मनुष्य विद्या को प्राप्त होकर अविद्या से मुक्त होता हो, संसार में नहीं है। यह भी ऋषि दयानन्द को विश्व का सर्वोत्तम महापुरुष सिद्ध करते हैं।

ऋषि दयानन्द ने महाभारत युद्ध के बाद समाज में उत्पन्न अन्धविश्वासों, पाखण्डों, सामाजिक कुप्रथाओं, शिक्षा व अध्ययन में अनेक प्रकार के प्रतिबन्धों का जमकर विरोध वा खण्डन किया और उन्हें वेदविरुद्ध, अविद्या का पोषक तथा मानव जाति के लिये अहितकर बताया। ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज ही आज देश में ऐसे महापुरुष व संगठन हुए हंै जिन्होंने अज्ञान व अन्धविश्वासों सहित सभी अविद्याजन्य मान्यताओं व सामाजिक कुप्रथाओं का खण्डन कर वैचारिक स्तर पर इनका निराकरण किया है। देश में महिलाओं को आज जो अधिकार प्राप्त हैं वह भी ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज की देन हैं। आर्यसमाज ने न केवल महिलाओं को वेदाध्ययन का अधिकार दिया अपितु उनके लिये कन्या गुरुकुल व कन्या विद्यालय आदि भी खोले। आर्यसमाज ने विधवाओं की दुर्दशा को समाप्त किया। कम आयु की विधवाओं के पुनर्विवाह को भी मान्यता दी। पुत्र-वधुओं को साम्राज्ञी जैसे शब्दों से सम्बोधित किया। बालक व पुरुषों की शिक्षा के प्रसार में भी ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज की भूमिका स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य है। डी.ए.वी. स्कूल, कालेजों सहित गुरुकुलों को खोल कर ऋषि दयानन्द के अनुयायी संगठन आर्यसमाज ने समाज को शिक्षित स्त्री व पुरुषों सहित वेदों के विद्वान, धर्माचार्य व पुरोहित भी प्रदान किये हैं। आर्यसमाज ने न केवल मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, मृतक श्राद्ध, अवतारवाद की मान्यता, जन्मना जाति प्रथा का विरोध किया वहीं ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज ने सभी मतों के अन्धविश्वासों व अविद्या को दूर करने का भी प्रयास किया। इसके लिये ऋषि दयानन्द द्वारा सत्यार्थप्रकाश सहित सभी मतों के आचार्यों व विद्वानों से वार्तालाप, शंका समाधान व शास्त्रार्थ कर अनेक प्रयत्न किये। सभी विपक्षी मतों के लोग अपनी न्यूनताओं को जानकर मौन हो गये। ऋषि दयानन्द ने अपने विचारों व तर्कों से पुनर्जन्म के सिद्धान्त तथा वैदिक कर्म-फल व्यवस्था को पुष्ट करने सहित जन्मना जातिवाद के उन्मूलन का कार्य भी किया। ऋषि दयानन्द ने मुक्ति व मोक्ष के सिद्धान्त को भी तर्क व युक्तियों सहित शास्त्र प्रमाण के आधार पर पोषित किया है। वेदों के विषय में उन्होंने घोषणा की है कि वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। इस सिद्धान्त को उन्होंने अपने ग्रन्थ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका सहित वेदभाष्य में स्पष्ट सिद्ध भी किया है। उन्होंने अनेक प्रमाणों से यह भी सिद्ध किया है कि इस सृष्टि की उत्पत्ति अब से 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 53 हजार वर्ष पूर्व हुई थी। यह कोई कम बड़ी देन नहीं है। ऋषि दयानन्द ने मनुष्य योनि में उत्पन्न सभी मनुष्यों को मननशील, सत्य का आग्रही तथा सच्चा आस्तिक मनुष्य बनाने का अपूर्व एवं अन्यतम कार्य किया। ऋषि दयानन्द पर एक कविता की यह पंक्तियाँ पूरी तरह से सत्य चरितार्थ होती हैं “ऋषिवर तेरे अह्सान को भूलेगा जहाँ वर्षों तेरी रहमत के गीतों को ये गायेगी जुबां वर्षों।”  

देश की आजादी को भी ऋषि दयानन्द की सर्वाधिक देन है। स्वराज्य व सुराज्य का मन्त्र भी ऋषि दयानन्द ने ही दिया था। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में उन्होंने 1883 में लिखा था ‘‘कोई कितना ही करे परन्तु जो स्वदेशीय राज्य होता है वह सर्वोपरि उत्तम होता है। अथवा मत-मतान्तर के आग्रहरहित, अपने ओर पराये का पक्षपातशून्य, प्रजा पर पिता माता के समान कृपा, न्याय और दया के साथ विदेशियों (अंग्रेजों) का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है।” ऋषि दयानन्द के इन वाक्यों को ही हम स्वतन्त्रता संग्राम को आरम्भ करने वाले प्रेरक सूत्र वाक्य कह सकते हैं। यह बता दें कांग्रेस की स्थापना इसके बाद सन् 1885 में हुई जिसे अंग्रेजों के कुछ कृपा पात्रों ने बनाया था। इन वाक्यों से प्रेरणा पाकर ही आर्यसमाज के सभी अनुयायी स्वतन्त्रता-संग्राम में, चाहे वह क्रान्तिकारियों का आन्दोलन रहा हो या अहिंसात्मक आन्दोलन, दोनों में ही सक्रिय भूमिका अदा करते हुए दिखाई देते हैं। स्वामी श्रद्धानन्द, लाला लाजपतराय, भाई परमानन्द, पं0 रामप्रसाद बिस्मिल आदि हजारों लोग आर्यसमाज और ऋषि दयानन्द के अनुयायी थे। इन सब कारणों से ऋषि दयानन्द संसार के सबसे शीर्ष महान महापुरुष सिद्ध होते हैं। हम जैसे साधारण व्यक्ति भी ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज की कृपा से ईश्वर व आत्मा को जान पाये और लोगों को भी इस विषयक प्रचार से लाभान्वित करने के लिये प्रयासरत हैं। ओ३म् शम्।

मनमोहन कुमार आर्य

परिचय - मनमोहन कुमार आर्य

नाम मन मोहन कुमार आर्य है. आयु ६३ वर्ष तथा देहरादून का निवासी हूँ। विगत ४५ वर्षों से वेद एवं वैदिक साहित्य सहित महर्षि दयानंद एवं आर्य समाज के साहित्य के स्वाध्याय में रूचि है। कुछ समय बाद लिखना आरम्भ किया था। यह क्रम चल रहा है। ईश्वर की मुझ पर अकथनीय कृपा है।