गीतिका/ग़ज़ल

गजल अहसासों की – पहली कडी

चांद की तरह वो अक्सर, बदल जाते हैं।

मतलब अली काम होते निकल जाते हैं॥

 

स्वाद रिश्तों का कडवा, कहीं हो जाय ना

छोटे मोटे से कंकड, यूं ही निगल जाते है

 

शौक तिललियों का हमने पाला ही नहीं

बस दुआ सलाम करके निकल जाते हैं

 

हौसले की पतवार हों, हाथों में जिनके।

तूफानों में भी वो लोग, संभल जाते है॥

 

वो बिछाते है जाल, दिलकश अदाओं से।

जानते है अच्छे अच्छे, फिसल जाते हैं॥

 

व्यापार चौराहों पर, बच्चों से ये सोचकर।

मासूमों से सख्तदिल भी, पिघल जाते हैं॥

 

बारिश की बूंदो मेंछिपी, बचपन की रवानी।

संग बच्चों के जवांदिल भी, मचल जाते हैं॥

 

शोर बर्तनों का सुनें, हमारे अडोसी पडोसी।

उससे पहले थोडा मकां से, टहल जाते हैं॥

 

सोच लो तुम पलाश, सच लिखने से पहले।

बडीं बेरहमी से लोग कलम, कुचल जाते हैं॥

परिचय - डॉ. अपर्णा त्रिपाठी

मैं मोती लाल नेहरू ,नेशनल इंस्टीटयूट आफ टेकनालाजी से कम्प्यूटर साइंस मे शोध कार्य के पश्चात इंजीनियरिंग कालेज में संगणक विज्ञान विभाग में कार्यरत हूँ ।हिन्दी साहित्य पढना और लिखना मेरा शौक है। पिछले कुछ वर्षों में कई संकलनों में रचानायें प्रकाशित हो चुकी हैं, समय समय पर अखबारों में भी प्रकाशन होता रहता है। २०१० से पलाश नाम से ब्लाग लिख रही हूँ प्रकाशित कृतियां : सारांश समय का स्रूजन सागर भार -२, जीवन हस्ताक्षर एवं काव्य सुगन्ध ( सभी साझा संकलन), पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनायें ई.मेल : aprnatripathi@gmail.com ब्लाग : www.aprnatripathi.blogspot.com

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