कविता

रंग गोरा ही देते

थोड़ा ही देते
लेकिन रंग गोरा ही देते
इस लाचार बदन पे
न स्याह रातों का बसेरा देते

कैसा खिलेगा यौवन मेरा
कब मैं खुद पे इतराऊँगी
उच्छ्वास की बारिश करा के
न कोहरों का घना पहरा देते

ढिबरी की कालिख सी
कलंकिनी मैं घर में
जब मुझे जन्म ही देना था
तो ऐसे समाज का न सेहरा देते

कौन मुझे अपनाएगा
और कब तक मुझे सह पाएगा
अपने तिरस्कृत होने की पीड़ा भूल जाऊँ
तो घाव कोई इससे भी गहरा देते

मैं चुपचाप सुनती रहूँ
और मैं कुछ भी ना बोलूँ
जिस तरह यह तंत्र अपंग है
मुझे भी अन्तर्मन गूँगा और बहरा देते

मैं काली हूँ
या सृष्टि का रचयिता काला है
आमोद-प्रमोद के क्रियाकलापों से उठकर
हे नाथ ! अपनी रचना भी लक्ष्मी स्वरूपा देते

मुझे नहीं शर्म मेरे अपनेपन से
मैं बहुत खुश हूँ मेरा,मेरे होने से
पर जो दुखी है,कलंकित हैं और डरे हुए हैं
उनकी बुद्धिबल को भी कोई नया सवेरा देते

— सलिल सरोज

परिचय - सलिल सरोज

जन्म: 3 मार्च,1987,बेगूसराय जिले के नौलागढ़ गाँव में(बिहार)। शिक्षा: आरंभिक शिक्षा सैनिक स्कूल, तिलैया, कोडरमा,झारखंड से। जी.डी. कॉलेज,बेगूसराय, बिहार (इग्नू)से अंग्रेजी में बी.ए(2007),जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय , नई दिल्ली से रूसी भाषा में बी.ए(2011), जीजस एन्ड मेरी कॉलेज,चाणक्यपुरी(इग्नू)से समाजशास्त्र में एम.ए(2015)। प्रयास: Remember Complete Dictionary का सह-अनुवादन,Splendid World Infermatica Study का सह-सम्पादन, स्थानीय पत्रिका"कोशिश" का संपादन एवं प्रकाशन, "मित्र-मधुर"पत्रिका में कविताओं का चुनाव। सम्प्रति: सामाजिक मुद्दों पर स्वतंत्र विचार एवं ज्वलन्त विषयों पर पैनी नज़र। सोशल मीडिया पर साहित्यिक धरोहर को जीवित रखने की अनवरत कोशिश। आजीविका - कार्यकारी अधिकारी, लोकसभा सचिवालय, संसद भवन, नई दिल्ली पता- B 302 तीसरी मंजिल सिग्नेचर व्यू अपार्टमेंट मुखर्जी नगर नई दिल्ली-110009 ईमेल : salilmumtaz@gmail.com

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