कहानी

सुप्यार

फुसफुसाहट भी दबे पाँवों चलती हुई पूरे गाँव का चक्कर लगा आई थी और अब घर में ही बने दो खेमों में घुसकर अपने यौवन को पा मुखरित स्वर बन चुकी थी।
 कुछ पढ़े लिखे लोग थे जो सुप्यार की बात का मजबूती से समर्थन कर रहे थे और दूसरे वे लोग थे जिन्होंने हमेशा अपने पुरखों की चली आ रही परम्पराओं से खुद को ऐसे बांध रखा था जैसे किसी गाय को मालिक खूँटे से बाँध देता है और वह तब तक उससे छूटने के प्रयास नहीं करती जब तक उसका मालिक आकर उसे चरने के लिए खेत में न ले जाये।
उस दूसरे खेमे की अगुवाई में सुप्यार का जेठ सुरेशसिंह सबसे आगे था जिसका समर्थन उसकी वह वृद्ध मंगेज बुआसा भी कर रहीं थी जो उस समय विधवा हुई थी जब वह केवल ग्यारह बरस की थी और उसके कुछ सालों बाद से उन्होंने अपना सारा जीवन पीहर में ही बिताया था। सफेद ओढ़नी में लिपटी गंजी खोपड़ी व कृशकाय देह में वह ऐसी प्रतीत होती थीं मानो कोई बिजूका खेत में चिड़िया उड़ाने के लिए खड़ा किया हो। उनके पति की मौत के समय जब उनके लंबे-लंबे काले बाल काट दिये गए थे उसके बाद न तो उन्होंने कभी बढ़ाये होंगे और न ही किसी ने बढ़ाने दिए होंगे।वह सख़्त औरत हर नई बहू को इतनी टोका-टाकी करती थी कि किसी को भी कभी पसन्द नहीं आती थी।
सुप्यार का पति भी उन्हीं का भतीजा था जो उनके छोटे भाई रामसिंह के तीन लड़को में सबसे छोटा था सुमेरसिंह, उससे बड़ा अवतार सिंह व उससे बड़ा सुरेश सिंह। मंझले अवतार सिंह व सुमेर सिंह की शादी एक साथ एक ही मंडप में दो सगी बहनों के साथ हुई थी लेकिन सुमेरसिंह की पत्नी तब कम उम्र थी अतः सुप्यार का गौना नहीं हुआ था।
 परन्तु कहते है न कि मर्द की मर्दानगी तो उसकी मूँछों के साथ ही आ जाती है और जब उसकी भाभी यानी अवतारसिंह की पत्नी अपने ससुराल पीहर आने जाने लगी तब उसकी इच्छा भी होती कि उसकी पत्नी को भी लेकर आए।
वह सोलह सत्रह वर्ष की उम्र से ही ग़लत संगत में शराब पीने लगा था और पीने के बाद उसकी कामेच्छा में भी अलग तरह की आग लग जाती थी। धीरे-धीरे उसने घर में इतना क्लेश बढ़ा दिया था कि घर वालों का जीना दूभर हो गया। परेशान होकर रामसिंह ने अपने बड़े बेटे सुरेशसिंह को बहू को लिवाने के लिए सुमेरसिंह की ससुराल भेज दिया था।
अंततः सुमेरसिंह की पत्नी आ गई। उसने उस शाम किसी तरह का उपद्रव नहीं मचाया था और चुपचाप अपने कमरे में सोने के लिए चला गया था लेकिन दूसरे दिन सुबह जब सुप्यार अपने कमरे से बाहर आई तब उसकी हालत बड़ी बहन ने देखी तो उसका भी हृदय रो पड़ा, जगह जगह दाँतों से काटने के निशानों से उसके शरीर पर नील पड़ चुके थे। सुप्यार की बड़ी-बड़ी आँखे जो रो-रोकर सूजकर और बड़ी हो गई थीं, बहन के आगे बरस पड़ी लेकिन उनका दुःख ऐसा था जिसे सुनने वाला वहाँ उन दोनों के सिवा और कोई नहीं था।
उस दिन भी जैसे-जैसे शाम गहराती जा रही थी,सुप्यार डर के मारे कांपने लगी थी उसकी ऐसी हालत देख, बड़ी बहन ने उसे सबसे बचाकर एक कोठरी में जहाँ कोई ज्यादा जाता न था जो सुरक्षित स्थान था, उसे छुपा दिया। गहराती रात में जब सुमेरसिंह घर में आया तब  नशे में उसके पाँव लड़खड़ा रहे थे। गाँव में वैसे भी बिजली कम रहती  थी , उस समय भी बिजली नहीं थी। वह अंधेरे में अपनी पत्नी को हर जगह ढूँढने लगा लेकिन जब वह नहीं दिखी तब उसके अंदर का राक्षस विकराल होकर पूरे घर में उपद्रव मचाने लगा।
कोने में रखा केरोसिन से भरा कनस्तर घर वालों को डराने के लिए उठा लाया था और डराने के लिये क्रोध में  केरोसिन खुद पर ही उंडेल लिया था। नशे में लड़खड़ाते कदमों और गुस्से से कांपते हाथों से माचिस भी जला ली ,लेकिन यह क्या? जो माचिस डराने के लिए निकाली थी वह तो दूर से ही आग पकड़ चुकी थी और पलक झपकते ही वह धू-धू करके जल रहा था।
गुस्से में फोड़े गए मटकों का पानी सब जगह फैला हुआ था वह उसमें लोटने लगा था जिससे क्षणिक शांति भी मिली लेकिन आग बुझी नहीं ,उसका चीखना-चिल्लाना बढ़ने लगा, घर के लोगों ने घबरा कर कुछ न कुछ जतन करने लगे। थोड़ी देर में वातावरण में एकदम शान्ति छा गई।
चारों तरफ सन्नाटा पसर गया था। ऐसा लग रहा था मानो भयंकर तूफान के आने के बाद अचानक सब शांत हो गया। लेकिन घर की महिलाओं द्वारा रात के अंधेरे को चीरता क्रंदन इस बात की गवाही दे रहा था कि तबाही बहुत ज्यादा हुई थी।
सुबह यह बात आग की तरह फैल गई थी। उस छोटी सी अबोध बालिका को दहाड़े मार रही औरतें उससे लिपट-लिपटकर कह रही थीं, “हे राम! तेरा सब कुछ लुट गया अब तेरा क्या होगा?”
 वह समझ नही पा रही थी कि जिस राक्षस ने एक रात में ही उसकी इतनी बुरी दशा कर डाली थी, जगह-जगह काटे हुए के निशान अब भी उसे पीड़ा पहुँचा  रहे थे,उसके मरने से उसकी जिंदगी बर्बाद कैसे हो सकती है? लेकिन सुबह जब उसकी लाश पर उन्हीं दहाड़े मारकर रोती औरतों के बीच उसे भी ले जाकर बैठा दिया गया और जब उसके हाथ की सुंदर-सुंदर चूड़ियों को तोड़ दिया गया और एक एक करके माथे की टिकली ,बिछिया सब कुछ खींच खींचकर उतार लिया गया तब वह अबोध भी चीत्कार कर उठी। वह उन सुंदर चूड़ियों के टूटने का दुःख था या सुहाग उजड़ने का, इसका अंदाजा सुप्यार व घर की औरते अपने-अपने अनुसार लगा रही थीं।
एक ही रात में ऐसा कुछ घटित हो चुका था जिसमें एक पंखुड़ी को फूल बनने से पहले ही तोड़ दिया गया और वह मसल कर गिरा दी गई। आंगन में हर जगह उसके दुःख की पत्तियां बिखरी पड़ी थीं जो उसकी व्यथा की साक्षी थीं।  पवन में भी सन्नाटा पसरा हुआ था जिसने चलना बंद कर दिया था जिससे वातावरण में गर्मी के साथ-साथ उमस भी बढ़ गई थी। किसी को भी उसके उस दुःख का लेश मात्र भी भान नहीं था जो उसने उस राक्षस के साथ पिछली रात को भोगा था, भान था तो उस दुःख का जो अब वह भोगने वाली थी। बिना श्रृंगार के अब वह मूर्तिकार की अधगढी मूर्ति सी बन कर रह गई थी।
तेहरवीं होने के बाद जब वह अपने मायके गई तब उसके ससुर ने कहलवा भेजा था कि बहू हमारे घर में ही रहेगी,जहाँ और प्राणी पलते है वहाँ वह भी पल लेगी और परंपराओं  में जकड़े गरीब बाप ने उसे उस नरक में वापिस भेज दिया था। अब उसकी हैसियत उस घर मे उस गधे जितनी थी जो सारे दिन जुता रहे और रात को सूखी घास से अपना गुजारा करे। मनहूसियत  उसके माथे पर चस्पा दी गई थी जो हर समय उसके आगे-पीछे घूमती रहती थी।
अब भी रात के साये उसे डराते थे ,कभी-कभी वह उस दुःख को अपनी बहिन से बाँटती भी थी लेकिन दोनों के आँसूओं को समझने वाला वहाँ दूसरा कोई नहीं था। लंबा सा घूँघट निकाले वह सर्दी, गर्मी, बारिश में भैंसों के बाड़े में ही मिलती थी। वहाँ बंधे जानवर भी उसे खुद से ज्यादा सुखी लगते जिन्हें कोई न कोई सहला देता था।
एक दिन तूफानी रात में जब  भैंस डर्रा रही  थी और वह उसे अंदर छपरे में बांधने के लिए पिछ्वाड़े में आई थी और जैसे ही वह भैंस को अंदर बांधकर मुड़ने लगी वहाँ पहले से ही दुबके एक साये ने उसके मुँह पर हाथ रखा ,वह चीखी,कसमसाई लेकिन उन गडगड़ाते बादलों में उसकी आवाज़ वहीं दब गई और उसको मसलकर वहीं छोड़, वह साया अंधेरे में ही गायब हो गया था लेकिन वह अपमान व वितृष्णा से भरी पता नहीं कब तक वहाँ बैठी रही। अब उसे खुद से ही घृणा होने लगी थी।
 सुबह वह एक बुत सी बनी अपनी बहन के पास गई और उसे वह सब बताया जो उसने रात को भोगा था ,दोनों में ही इतनी हिम्मत नहीं थी कि यह बात किसी को बताए क्योंकि उन्हें अहसास था कि उन पर ही कुछ न कुछ उल्टा सीधा आरोप लगाया जाएगा इसलिए उन्होंने  हमेशा के लिए अपने मुँह पर ताला लगाने में ही अपनी भलाई समझी। उस दिन के बाद तो वह जिंदा लाश में तब्दील हो गई थी। उस काली रात की उसे केवल एक निशानी याद थी,उस छटपटाहट व हाथापाई में उसने महसूस किया था कि उस राक्षस के पीठ पर एक छोटा सा गूमड़  है लेकिन वह यह बात न किसी को कह सकती और न ही पूछ सकती थी।
आज दस साल बाद भी वही दोहराव इस घर में हुआ था।
बड़े जेठ का बेटा शादी के एक महीने बाद ही दुर्घटना में चल बसा था और बहू शालू के साथ वही कुछ हुआ था जो सुप्यार ने भोगा था ।
सुप्यार ने एक अलख सी जगा दी थी कि शालू का पुनर्विवाह किया जाएगा। घर वाले आश्चर्य चकित थे कि अब अचानक इसकी ज़ुबान इतनी लंबी कैसे हो गई है? कई ऐसे भी थे जिन्होंने उसे कहा कि तुम भी तो हो जो इतने नियम बरत से अपना जीवन जी रही हो अब क्या जरूरत है इस परंपरा को तोड़ने की, तुम्हें क्या मिलने वाला है?
शालू के माता पिता को भी बुला लिया गया और उन्हें  कहा गया कि शालू को आप समझा दो कि सुप्यार की बातों में न आए और इस खेमे की पैरवी करने वाला कोई और नहीं बल्कि शालू का ससुर यानि सुप्यार का बड़ा जेठ सुरेशसिंह ही था।
गांव में जितने मुंह उतनी बातें, कोई उसे खुदगर्ज़ बताए  बोले,”खुद तो अपना धर्म निभा ले गई,अब दूसरी की बारी आई तो यश की भागीदार शालू न बन जाये, इस लिए इसको ब्याह के लिए तैयार कर पाप की भागी बनावे है।”
“पता नहीं कब और कैसे इसकी  जबान इत्ती लंबी हो गई कि बड़ों का भी कोई लिहाज़ न करे है।वह कब किसको भड़का दे कोई कह न सके।” लाठी टेकती हुई एक बुढ़िया बोली।
मंगेज बुआसा जिन्होंने खुद कभी नहीं चाहा था कि सुप्यार कभी अपने सिर का पल्लू हल्का सा भी सरका ले  परन्तु आज वह अपनी लाठी टेकती हुई सुप्यार को एकांत में ले गई और वहाँ उन्होने उसका चेहरा गौर से देखा। उन्हें महसूस हुआ कि उसके चेहरे पर छाई उदासी के पीछे गमों की कोठरी में से कुछ तो ऐसा दिख रहा था जो उसे इस विद्रोह के लिए मजबूर कर रहा था।
बुआ सास के पहली बार कुछ स्नेहभरे बातों को सुनकर वह आज पिघल गई थी और बोली, “बुआसा मैं चाहती हूँ कि जिस नरक को मैंने जिया है उसे शालू को न जीना पड़े।”
“किस नरक की बात कर रही है तू? यह तो तेरे पिछले जन्म के करम थे जो तनै इस जन्म में भोगने पड़ै हैं।” भाग्य की अठखेलियों के सहारे जीवन बिताने में विश्वास रखने वाली बुआ बोल उठी।
 तब सुप्यार ने अपना कंठ साफ किया और नज़रें नीचे किये बैठी रही ,बोलने की कोशिश कर रही थी लेकिन बोल न फूट रहे थे। फिर थोड़ी देर में खुद को संयत करके बोली, “बुआसा मैं मेरे पापों का फल भोग रही हूँ लेकिन शालू क्यों भोगे उस यातना को–अचानक वह कुछ कहती कहती रुक गई थी।
“किस यातना की बात कर रही है रे तू, कुछ बोलोगी भी या यूँ ही पहेलियां बुझाती रहैगी?”
“अंधेरे में इस घर के लोग राक्षस बनकर हम अभागिनों को उस लाश में तब्दील कर देते है जो न जीती हैं न मरती हैं।” लगभग रोती हुई सी सुप्यार ने अपनी बात पूरी कर ही दी।
“बीनणी, इत्ता घिनौना आरोप तू इस परिवार के लोगों पर कैसे लगा सके है?” कुछ चिंतित सी होकर बुआ बोलीं, लेकिन आज वह सुप्यार पर क्रोधित होने के बजाय थोड़ी नरम थी इसलिए उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा  जिससे सुप्यार को थोड़ा साहस मिला और उसने अपना सिर बुआ की गोद में टिकाकर उसके साथ उस तूफानी रात को घटित हुए हादसे के साथ-साथ उस गूमड़ के बारे में भी बता दिया था जो उस राक्षस की पीठ पर था और उसकी नजरें अब भी उसको कहीं न कहीं ढूँढती रहती थीं ।
वह उनकी गोद में ही सिर रखकर बहुत देर तक रोती रही। उसकी करुण कथा सुनकर आज मंगेज बुआसा ने अपने मोम दिल के ऊपर रखे गए पत्थर को हटा दिया था और वहाँ से स्नेह का झरना बहने लगा था जो सुप्यार को उसमें भिगोए ले जा रहा था।
“मेरी बच्ची, तूनै इत्ता बड़ा दुःख झेला और उस पहाड़ को अपने सीने में दबाए न जाने कितनी रातें जागी होगी और हमें किसी को रत्ती भर भी अहसास न था तेरे उस दुःख का, पण अब मैं थारै साथै हूँ और थारै साथ-साथ शालू नै भी न्याय दिलार रहस्यूँ।”
आज बुआसा के मन के घाव भी  हरे होकर  टीस मारने लगे थे जो बरसों पहले उनकी आत्मा तक को चीर गए थे और उनकी टीस इतनी गहरी थी कि वह आज भी आँसू बनकर कोरों को भिगो गई। बस यही वह क्षण था जिसमें बुआसा, सुप्यार के साथ हो गई थीं।
उधर सुरेश सिंह ने पूरे घर के सदस्यों को ही नहीं मोहल्ले व गाँव वालों को भी सुप्यार के विरोध में भड़काने में कोई कसर न रखी थी। लेकिन अब सुप्यार को उसकी ज़िद से डिगाने का साहस किसी में नहीं था। जब घर के सब लोग खाना खा चुके थे तब एक चारपाई पर बैठे सुरेशसिंह के पास जाकर मंगेज बुआसा बैठ गईं और उससे बोली,”बेटा, मैं तुमसे आखिरी बार कै री हूँ कि तू शालू की दूसरी शादी के लिए ‘हाँ’ कर दे और उसे इस नारकीय जीवन से आज़ादी दिलवा दे।”
“बुआसा,आप भी कैसी बातें करो हो,आपने कुल में कदैई ऐसो सम्भव होयो है कि अब होसी।”
“न बेटा, ऐसो कदैई न हुयो पण अब इण सम्भव करया ही पार पड़सी और मैं नी चाहवूँ कि शालू म्हारी बदनसीबी ने आगे बढ़ावे और सुप्यार ने मैंने बतानो नि पड़े कि बो ‘गूमड़’ थारी पीठ पर है।”
“अब निर्णय थारे हाथ में है कि म्हारे जेठ री जियाँ जेळ में चक्की पीसण जावणु है या शालू री जिंदगी बणावनि है।”
उसके अगले दिन से ही नज़रें नीची किये सुरेशसिंह, शालू को बेटी की तरह विदा करने के लिए रिश्ते ढूँढ़ रहा था और उधर सुप्यार को संतोष था कि वह खुद के लिए न सही परन्तु शालू के लिए  जंजीरों को तोड़ पाई। बरसों से जमी हुई उसकी उदासियों के घेरे में से निकली चिंगारी अब आग बनकर रोशन करने वाली थी।
— कुसुम पारीक

परिचय - कुसुम पारीक

B 305 राजमोती 2 पो.ओ. वापी जिला -वलसाड गुजरात पिन- 396195

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