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कोरोना: मानव नस्ल ख़त्म करने की पहल

बहुत हो चुका कोरोना का रोना। कोई कह रहा मैनें इसे हरा दिया, कोई नए नए इलाज बता रहा।  कोई इसके लिए चीन, कोई मांस खाने की बात बता रहा। कोई मरकज कोई हरिद्वार कुम्भ को जिम्मेवार बता रहा।  कोई मास्क पहनने, कोई न पहनने की दलील दे रहा, कोई जड़ों का नहीं पत्तों का इलाज बताकर जलील हो रहा। कोई दो गज की दूरी, कोई देसी इलाज बता रहा, कोई इम्मयूनिटी, कोई खान-पान पर जा रहा।

कोई भाईयो-बहनो, मित्रो, ओ दीदी में उलझा है, पर किसी से कुछ भी न सुलझा है। किसी ने भी अब तक ईश्वर या यूँ कहो की प्रकृति की बात नहीं की। अब धीरे धीरे ‘चंद’ लोगों की समझ में ‘थोड़ा बहुत’ आया है। यह प्रकृति के समझाने का तरीका है, जो समझ जाए तो उसकी मर्जी। न समझे तो जय राम जी की बोलो और हमेशा के लिए इंसानी नस्ल को सलाम भेजो। जी हाँ, प्रकृति लाखों वर्षों से ऐसा करती आ रही है।  कुछ नस्लें जैसे डायनोसोर, कई प्रकार के शेर  इत्यादि कई लाख वर्ष तक जीने के बाद लुप्त हो गए । क्या मनुष्य यह समझता है की वह सर्वश्रेष्ठ है, उसकी नस्लें सदैव बनी रहेंगी।

पशु भूख होने पर, अपनी, अपने बच्चों की रक्षा में, दूसरों पर आक्रमण करते हैं। मनुष्य क्या करता है, अपने स्वाद के लिए, अपनी इन्द्रियों की तुष्टि के लिए, अपनी नस्ल और  दूसरे जीवों की जान लेता है। अपनी और दूसरी नस्लों पर अपने मनोरंजन तक के लिए क्रूरता करता है। मानव धरा से क्या क्या लेता है, बदले  में उसे  क्या देता है। क्या यह प्रकृति सदैव सहन करेगी ? या प्रकृति इस नस्ल को नष्ट करके दूसरी नस्ल को आगे लाएगी ?  प्रकृति प्रयोग करती है, बदलाव करती है। वही नस्ल जिन्दा रहती है, जो प्रकृति के अनुकूल चले। प्रकृति के विरुद्ध चलने वाली नस्ल विलुप्त हो जाती है। क्या हम प्रकृति को सहयोग दे रहे हैं या उसे नष्ट करने में लगे हैं ? यदि अभी भी हमने कोरोना से कुछ नहीं सीखा तो कहीं यह हमारे सीखने का अंत न साबित हो जाए। एलियन मनुष्य से श्रेष्ठ हैं। हो सकता है कोरोना इस मानव नस्ल को ख़त्म करने की पहल हो।

समस्या ना चीन है, ना मुस्लिम, ना कोरोना।  समस्या है कोई आज भी हिन्दू को सर्वश्रेष्ठ बता रहा है, कोई मुस्लिम, कोई ईसाई को।

फिल्म: धूल का फूल
तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा।
नफरत जो सिखाये वो धरम तेरा नहीं है,
इंसान को रौंदें वो कदम तेरा नहीं है।
कुरआन ना हो जिसमें वो मंदिर नहीं तेरा,
गीता ना हो जिसमें वो हरम तेरा नहीं है।
तू अमन का सुलह का अरमान बनेगा
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा।
ये दीन के ताजर ये वतन बेचने वाले,
इंसान की लाशों के कफ़न बेचने वाले,
ये महलों में बैठे हुए कातिल ये लुटेरे
काँटों के वज्र हैं चमन बेचने वाले।
तू इनके लिए मौत का ऐलान बनेगा,
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा।

— रविन्दर सूदन 

One thought on “कोरोना: मानव नस्ल ख़त्म करने की पहल

  1. एनवाईयू लैंगो हेल्थ में चाइल्ड एंड एडलोसेंट सायकेट्री की प्रमुख डॉ. हेलेन एगर की ताजा स्टडी के मुताबिक 3 साल तक के बच्चों में भी अ‌वसाद दिख रहा है। चिड़चिड़ापन और गुस्सा गहरे अवसाद के लक्षण हो सकते हैं। इसी के चलते उनके मन में खुदकुशी के ख्याल आते हैं।पिट्सबर्ग यूनिवर्सिटी में सायकेट्री की प्रोफेसर मारिया कोवाक्स कहती हैं कि बच्चे अवसाद के कारण दुखी नहीं दिखते, बल्कि उनमें चिड़चिड़ापन दिखता है। वे खुद भी नहीं समझते कि ऐसा क्यों कर रहे हैं। घर के बड़ों को ही ये संकेत समझने होंगे।कोरोना के केस बढ़ने के कारण एहतियात के तौर पर स्कूलों में ऑफलाइन क्लासें बंद होने से स्टूडेंट्स को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। एक और तो घर में रह-रहकर किशोर परेशान हो चुके हैं। वहीं, उनके व्यवहार में भी बदलाव आने से वो गुस्सैल होते जा रहे हैं। वहीं, कुछ स्टूडेंट्स डिप्रेशन और एंग्जाइटी का शिकार होते जा रहे हैं। साइकोलॉजिस्ट के पास रोज ओपीडी में 5 से 7 नए केस आ रहे हैं, जो सिर्फ एक ही अस्पताल की स्थिति है।डॉ. निधि, साइकोलॉजिस्ट, सीएमसी डॉ. तरलोचन सिंह, साइकोलॉजिस्ट, हुंजन अस्पताल

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