इतिहास

स्वामी विवेकानंद

सत्य तक पहुचना ये मानवीय लक्ष हे ,वह संवेदना का कोई स्थान नहीं हे ,और जो इंद्रियो से स्पर्श का एहसास होता हे उसे भी कोई स्थान नहीं हे ,सिर्फ शुध्ध तर्क के प्रकाश को ही स्थान हे ,मानव वह आत्मा स्वरूप हे

मकर सक्रांति के पावन अवसर पर सूर्योदय होने की तैयारी के समय ई।स॰ 1919 को पोष महीने मे वद सातम सन १८६३ जनवरी महीने की दिनांक १२ सोमवार के दिन भारत के आध्यात्मिक व धार्मिक जीवन मे एक नए सूर्य का जन्म हुआ वो थे बंगाल के सपूत नरेंद्र नाथ दत्त,विश्वनाथ दत्त और भूनेश्वरी देवी के प्यारे पुत्र ,श्री राम कृष्ण परम हंस के प्रिय शिस्य ,भारत के पूजनीय आदरणीय सन्यासी ,विश्व के एक महान आध्यातम पुरुष स्वामी विवेकानंद ,

प्रजा की एक अलग विशिसटता होती हे, भारत की बेंगोली प्रजा अनेक क्षेत्र मे प्रसिध्ध हे ,विश्व मे नाम कमा रही हे ,उसने जगदीश चन्द्र जेसे महान वैगनानिक दिये हे ,सुभाश्चंद्र बॉस जेसे आजादी के स्वातंत्र्य सेनानी दिये हे ,रवीन्द्रनाथ टैगोर जेसे महान साहित्यकार दिये ,सत्यजित रे जेसे सिने दिग्दर्शक दिये ,सांगीत ,और नाट्य क्षेत्र मे भी ये प्रजा अग्रेसर रही थी आध्यात्म क्षेत्र मे तीन तीन महान पुरुषो ने बंगाल की धरती पर जन्म लिया ,जिस मे श्री अरविंद घोष,श्री रामकृष्ण परम हंस और उनके परम शिष्य नरेंद्र नाथ दत्त –स्वामी विवेकानंद ।

बचपन:

नरेन्द्रनाथ के चरित्र्य के घडतर मे तीन बाबत मुख्य हे, १.कौटिम्बिक संस्कार २॰,ज्यादा अध्ययन का प्रभाव ३।श्री रामकृष्ण परम हंस का मार्ग दर्शन ,मात-पिता के संस्कार ।भारतीय संस्कृति के प्रति श्रद्धा ,श्री रामकृष्ण परम हंस आद्यत्मिक मार्ग के गुरु बने ,उनके परिवार मे सन्यास वृति पहले से ही थी,उनकी बहन स्वर्णमई और छोटे भाई महेंद्र साधू जेसा सादगी भरा जीवन व्यतीत करते थे ,दूसरे छोटे भाई क्रांतिकारी थे,उनके पिताजी हाइ कोर्ट मे ‘एटरनी एट लो’थे,वे इंग्लिश और फारसी भाषा मे प्रवीण थे,उनकी मटा भूनेश्वरी देवी शिव भक्त थे,नरेंद्र नाथ का नाम पहले विरेश्वर रखा गया था ,बाद मे उनकी मटा ने नाम बदलकर नरेन्द्रनाथ रखा था ,नरेन्द्रनाथ बचपन मे बहुत तूफानी थे ,उनकी माता ने राम की कथा सुनाई तो वे सीताराम क मिट्टी की मूर्ति खरीदकर पुजा करने लगे,बचपन उनके

जीवन मे एक आलोकिक घटना बनी,वो रात मे सोते थे तब उन्हे बंद आंखो मे प्रकाश दिखता था ,रंग बदलते रहते थे ,उनके पूरे शरीर पर प्रकाश फ़ेल जाता था ,ईएसए पूरे जीवन तक होता रहा ,यह घटना नरेंद्र नाथ के पूर्वा जन्म की आलोकिक घटना आद्यत्मिक विकाश की सूचक थी ,एक बार नरेन्द्रनाथ ध्यान मे बैठे थे ,तब एक साँप निकला,तब सभी बच्चे भाग गए ,नरेन्द्रनाथ बैठे रहे। उनकी माता ने पूछा तो बताया की मे तो ध्यान मे बैठा था ,उन्हे पाठशाला मे पढ़ाई के लिए भेजा गया तो वे खराब चीजो का अनुसरण करने लगे इस लिए उन्हे पढ़ा ने के लिए घर पर शिक्षक की व्यवस्था की गई ,उन्हे पशु पंखी रखने का शोख था ,एक विध्यार्थी को शिर मे चोट आई तो उन्होने अपनी धोती फाड़कर पट्टी बांध दी ,और डॉक्टर के पास ले गए ,डॉक्टर कि फीस के लिए सभी बच्चो से पैसे इकट्ठे किए ,स्कूल मे उन्होने अङ्ग्रेज़ी कठिन लगनेके बावजूद शिख लिया ,शिक्षक को आश्चर्य हुआ ,

साधू सन्यासी से बहुत आकर्षण था ,उन्हे कुदरती प्रेम था साधू ओके प्रति ,एक बार उन्होने एक साधू को नया धोती भिक्षा मे दे दिया ,नरेंद्र अपने मित्रो से कहते थे की,मेरी हस्त रेखा देखकर एक ज्योतशी ने हमे बताया हे की ,नरेंद्र तुम स्न्याशी बन जाएगा ,वे बहुत ही निडर थे,उन्हे नाटक का शोख था ,लेकिन उनके चाचा जी ने उनकी नाट्य मंडली को बिखेर दिया था ,घर के पास मे ही फिर व्यायाम शाला शुरू कर दी,चाचा ने उनके साधन जप्त कर लिए तो उनका हाथ तोड़ दिया ,उन्हे पढ़ाई प्रेम था ,बड़े होकर आध्यात्मिकता की ओर मुड़े ,उन्होने राम चरित मानस और महा भारत की कथा ये सुनी थी ,श्री राम की कथा ने उनके मानस पर गहरा असर डाला था ,उन्हे बचपन मे कोचमेन के साथ दोस्ती थी,बड़े होकर वे कोचमेन बनने की इच्छा रखते थे,घोडा घड़ी के कोचमेन नहीं लेकिन भारत के –विश्व के धार्मिक रथ के सारथी बने ,उन्हे पूर्वा जन्म की स्मृति बार बार होती थी ,ज्यादा पुस्तक पढ़ ने के शोख के कारण वे पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव मे आ गए ,हर्बट स्पेन्सर की फिलोसोफी ने उन्हे आकर्षित किया ,जर्मन फिलसोफ़ों कान्त और शोपन होर तथा जॉन स्टुआर्ट मिल और अगस्त कोमो क तत्व ज्ञान का अभ्यास किया ।एरिस्टोटल के विचारो को समाजने लगे ,उन्हे तत्व ज्ञान ।शरीर विज्ञान ,विश्व का इतिहास और कविता मे भी रस था ,

नरेंद्र नाथ ने एक बार रामकृष्ण परम हंस से पूछा था की,आपने ईश्वर को देखा हे ?तब रामकृष्ण ने बताया की ,हा जेसे मे तुम्हें देखता हुएसेही ईश्वर को देखता हु,ईश्वर देख शकु इस तरह मे तुम्हें देखता हु,श्री रामकृष्ण के ये वचन से नरेन्द्रनाथ बहुत प्रभावित हुए ,रामकृष्ण के सनिध्या मे नरेन्द्रनाथ का आध्यात्मिक विकाश हुआ ।नरेन्द्रनाथ के पिताजी ने शादी के लिए बहुत प्रयास किए लेकिन वो सफल नहीं हुए ,उनके पिताजी का अवसान हुआ ,बाद मे लोग शादी के लिए दबाव डालते थे ,तब कहते की हमे डुबो देना हे ,पिताजी की मृत्यु के बाद घर चलाने के लिए उन्होने शिक्षक की नोकरी शुरू की,रामकृष्ण की बात मानकर वो जगदंबा के मंदिर गए,वह वे दिव्य आवेश मे आ गए ,उन्होने विवेक वैराग्य भक्ति और ज्ञान दे ,तेरे दर्शन होते रहे एसा वरदान दे,रामकृष्ण ने पूछा की क्या मांगा ?सांसरिक गरीबी मिटाने के लिए माँ से प्राथना की ?वो तो मे भूल ही गया ,फिर से जा और तुम्हें जो चाहिए वो बात कर ,रामकृष्ण के कहने से वो तीसरी बार मंदिर गए ,कोलकाता जानेसे पहले नरेन्द्र नाथ रामकृष्ण से मिलने गए तब वे हुक्का पी रहे थे ,उन्होने नरेन्द्रनाथ को भी हुक्का पिलाया ,फिर गुरुदेव हुक्का पीने लगे तो नरेंद्र को संकोच हुआ ,उन्होने गुरुदेव को कहा की पहले आप हाथ धो लीजिये ,गुरुदेव फिर हुक्का पीने लगे ,नरेन्द्रनाथ को एहसास हुआ की गुरुदेव को उनके प्रति कितना प्रेम हे ,

सन 1885 मे रामकृष्ण को गले का कैंसर हुआ था ,नरेन्द्रनाथ और अन्य शिष्य रामकृष्ण की निस्ठा से सेवा करते थे एक दिन रामकृष्ण ने नरेन्द्रनाथ को कहा की वो रामनाम का गुरु मंत्र पाये थे ,ईएसए कहकर उन्होने नरेन्द्रनाथ को रामनाम का मंत्र दिया ,नरेंद्र नाथ को गुस्सा आया ,हे राम करते करते मकान की आसपास चक्कर काटने लगे ,गुरुदेव के सनिध्य मे उन्हे आध्यात्मिक शक्ति प्रपट हो गई हे ईएसए मानकर ए शक्ति गुरूभाई पर आजमाई ,नरेन्द्रनाथ का स्पर्श होते ही उसका हाथ कापने लगा ,१६अगस्त १८८६ मे श्री रामकृष्ण परमहंस दुनिया छोड़कर चल बसे ,गुरुदेव की समाधि के एक सप्ताह के बाद नरेंद्र नाथ को अद्भुत अनुभव हुआ ,गुरुदेव के दर्शन हुए ,काशीपुर के गार्डन मे एक प्रकाशित आकृति उनकी ओर आगे बढ़ती देखि ,रामकृष्ण की मृत्यु बाद नरेंद्र नाथ के बहुत अनुयाई बने उन्होने इशू की कथा रस पूर्वक सभी को सुनाई ,नरेन्द्रनाथ का ह्रदय भक्ति से भरपूर था ,वरहनगर मठ मे नरेन्द्रनाथ और अन्य शिष्यो ने विधि पूर्वक विरजा होम किया ,आजीवन ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह की प्रतिगना ली ईश्वर प्राप्ति के लिए जीवन समर्पित किया ,पूर्वा जीवन के संबंध और संसारी नाम छोड़कर सन्यास धरण कर लिया ,नरेन्द्रनाथ ने उसी समय ‘विवेकानंद ‘नाम धरण किया ,सन १८८७ से १८९३ तक भारत ब्रामान किया ,गुरूभाईओ को अपना पता न मिले इस लिए वे नाम बादल लेते थे ,जिस मे विवि दिशा नन्द ,सचिदानंद इत्यादि नाम मिलते हे ,

एक बार वो वृंदावन जा रहे थे ,रास्ते मे उन्होने एक इंसान को चलम पीते हुए देखा ,स्वामी को भी चलम पीने की इच्छा हुई ,वो इंसान ने बताया की वो शूद्र जाती का हे ,विवेकानंद को लगा की इस से चलम केसे पी सकते हे ,शूद्र से चलम पीने रुक गए ,उन्होने उस इंसान से चलम लेकर पी,क्यू की मन मे विचार आया की सभी इंसान एक जेसे ही हे ,उसे धिककरणा नहीं चाहिए ,सभी भगवान के बालक हे,उनके पिताजी वकील थे ,सभी क्लायंट के लिए हुक्का बैठक रम मे रखा गया था ,विवेका नन्द भ कभी कभी हुक्का पीते थे,शूद्र से चलम लेकर पीने के प्रसंग के बाद चलमौर हुक्का पीना छोड़ दिया,जातिऔर संप्रदाय वाले हिन्दू समाज व्यवस्था का उन्होने सख्त विरोध किया था ,विवेककानन्द अमरीका गए,शिकागो की वैभव और संशोधन कार्य से वे बहुत प्रभावित हुए ,अमरीका मे विश्व धर्मा परिषद के लिए उन्होने सुना था ,विवेकानंद विश्व धर्मा परिषद के कार्यालय मे पहुचे,उन्हे पूछा गया की कौनसी संस्था से आ रहे हो?वे किसी संस्था किओर ए गए नहीं थे ,इस लिए व्यवस्थापक ने उनका नाम लिखने से माना कर दिया ,उन्होने अमरीकन वेश धरण किया ,परिषद की कमिटी के सभ्य और हवार्ड यूनुवर्सिटी के प्रोफेसर ने परिषद को पत्र लिखा ,प्रो।राइट विवेकानंद से प्रभावित थे ,११ वी सितंबर १८९३ को विश्व धर्मा परिषद मे विवेकानंद ने हिन्दू धर्म के लिए अपने वक्तव्य मे हिन्दू धर्म के समग्र स्वरूप का वर्णन किया,आत्मा,उसकी गति,वेदान्त का तत्व ज्ञान और इंसान के आखरी ध्येय की समज दिया,विश्व के सभी धर्मो के प्रतिनिधिओ का ध्यान विवेकानंद जी की ओर गया ,विवेकानंद ने माँ सरवाती की प्रार्थना करके अपना वक्ताव्य दिया था ,अमरीका के मेरे भाई ओ और बहनो बोलकर अपनिबट शुरू की ,तालीयोकी आवाज गुंज ने लगी,सभा के सदश्यों को अमरूत के संतान कहकर सम्बोधन किया था ,सभी आश्चर्य चकित हो गए ,विवेकानंद जी सर्व श्रेस्ठता का बिरुद अहसील करने मे सफल हुए ,द न्योर्क हेरोल्ड पत्रिका ने लिखा की स्वामी विवेकानंद विश्व धर्मा परिषद के सबसे महान व्यक्ति हे,बहुत सारी विश्व पत्रिका ओने उनकी तारीफ़ की ,

उप संहार

स्वामी विवेका नन्द जी के नाम से ही हमे उत्साह ,आत्म विश्वाश,परोपकार की भावना और राष्ट्र भावना पेड़ा होती हे ,युवाओ मे प्रिय ये विरल संत की मृत्यु ३९ साल की उम्र मे हुई थी ,स्वामी विवेका नन्द जी ने देश और विदेश की धरती पर लोक जागृति पेड़ा करनेमे सफलता प्राप्त की थी,उन्होने खास करके युवनों मे धर्म और रास्ट्रीयता के पाठ पढ़ाकर प्रशांशनीय कार्य किया हे ,

गीता और उप निषदों का उन्होने विस्तृत प्रचार किया हे ,लेकिन स्वामीजी ने अपने जीवन की अंत वर्षो मे संस्कृत व्याकरण का गहन आभ्यास करने का प्रयास किया था ,उनकी महर्षि पनि रचित संस्कृत व्याकरण और बाद मे वेदो का अभ्यास करनेकी उनकी अंतिम इच्छा अधूरा ही रह गया ,स्वामी विवेकानंद जी उनके जीवन के अंतिम वर्षो मे एसी अनुभूति करते थे की भारतीय संस्कृति ,सभ्यता ,परंपरा के मूल वेद तथा वैदिक सिद्धांतों मे ही रहा हे ,वैदिक ज्ञान का प्रचार ,संस्कृत भाषा की रक्षा ,अंध विश्वाश ,तथा रस्म का उन्मूलन करने वैदिक उपदेशको का निर्माण करनेका लक्ष्य था,शास्त्रो की विषमता दूर करने के लिए भी वैदिक ज्ञान ही महत्व की भूमिका अदा कर सके ईएसए उनका मानना था ,इस लिए ही उन्होने शिक्षण क्षेत्र के साथ जुड़े हुए महान व्यक्ति के साथ तत्कालीन कोंग्रेषि नेता ओ को जब वो मिलते तब वैदिक कॉलेजो की स्थापना करने के लिए प्रेरित करते थे,

स्वामी विवेकानंद जी के यह वेद विषयक विचारो का होने चाहिए इतना प्रचार नहीं हुआ हे ,स्वामीजी वेद के महत्व को समजे तो सही लेकिन समाज मे वेदो को पुनः गौरव पूर्णा स्थान दिलाने मे उन्हे पर्याप्त समय मिला नहीं ,स्वामीजी के यह अधूरे रह गए अत्यंत महत्व पूर्णा कार्यो को लोको समाज शाके इस लिए स्वामी विवेकानंद जी के प्रामाणिक जीवन चरित्र्य मे से ही उनके वेद और संस्कृत भाषा के प्रति उनकी अनन्या श्रद्धा को उजागर करते पुस्तक का प्रकाशन हो रहा हे ,

स्वामीजी की वेद के प्रचार की यह अधूरी इच्छा को उनके शिष्य तथा प्रसंशकों ने पूरा करना ही होगा ,स्वामीजी की मृत्यु को १५७ वर्ष हो गए हे ,उनकी 150 की जन्म जयंती के अवसर पर ससमगरा भारत देश मे विविध कार्य क्रम कर के समारोह मनाया गया था iएसे महान मानव को हम भी वंदन अर्पित करते हे i

— डॉ गुलाब चंद पटेल

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