कविता

गुमसुम हो अगर कोई साथी

गुमसुम हो अगर कोई साथी तो पुकारना जरूर अपनों से हो जंग तो हारना जरूर चुप रह जाए वो अगर तुम्हारी किसी बात पर देर मत करना तनिक माफी मांगना जरूर रूठ कर कभी वो मुंह फेर ले अगर सारे गिले शिकवे छोड़कर मना लेना जरूर टूटते हैं दिल अक्सर बड़ी छोटी सी बात पर […]

कविता

खतरा

सुनसान सी गली में एक परछाई तक नहीं है क्यों बंद हो गए घरों में है अंधेरा इतना ज्यादा खतरा किससे है किसको यह तय नहीं हुआ अभी तक हर कोई सशंकित है दूसरे से आखिर क्यों इतना ज्यादा एक मकान में रहने की आदत पहले भी थी मुसाफिरों सी क्यों उदास हो इस कदर […]

कविता

चलना जरा संभल के

रास्ते हैं क़ाफ़िर मंजिलें हैं मुसाफिर मुश्किल बहुत सफर है चलना जरा संभल के चंचल बड़ी है मंजिल ठहरती नहीं है मंजिल छोटी सी थी जो एक दिन बढ़ती ही जा रही है मंजिल मैं भागता जा रहा हूं नहीं हाथ आ रही है मंजिल बेशक, भागो इसके पीछे तुम जब तक भाग पाओ तुममें […]

कविता

किनारा…

पूछता है रास्ता कोई सहारा ढूंढता है बावला है-जिंदगी में किनारा ढूंढता है सुबह शाम अपनी मुसीबतों को गिना कर दुआओं को अपनी बेअसर बता कर जाने किस खुशी का सिरा ढूंढता है बावला है-जिंदगी में किनारा ढूंढता है उम्मीदों की गठरी सिर पर उठाकर न चलना तू राही खुदी को भुलाकर सब भटके हुए […]

कविता

कट गई जिंदगी एक पतंग सी

कट गई जिंदगी एक पतंग सी गति हुई भंग की तरंग सी स्याह हुई सब रिश्तों की गांठें दुख सुख अब कौन किसके साथ बांटे भीड़ भरी राहों में पसरा सन्नाटा दूरियां हैं इतनी कि अब कोई नहीं भाता कट गई जिंदगी एक पतंग सी… कट्टी करते थे बचपन में फिर मिल्ली भी होती थी रिश्ते सब सोते थे सटकर खाट […]