लघुकथा

लघुकथा : दहशत

बार-बार घड़ी को देखते हुए रेखा उकता उठी। “बारह बजने को आये,नहीं आना तो यह भी नहीं कि एक फ़ोन ही कर दे।” अपने आप ही बड़बड़ाये जा रही थी। इतने में दरवाज़े की घंटी बजी। रेखा दरवाजे पर ही तुलसी को डाँटने लग गई। “आधा दिन गुजरने को आया तुलसी आजकल ये रोज की आदत बना ली […]

कुण्डली/छंद

मनहर घनाक्षरी छंद

मनहरण घनाक्षरी छंद 1. छाये रहे घनश्याम, आये नहीं घनश्याम जाने किस ओर गये, जाने कहाँ बरसे अमिय प्रेम सागर, भरने लाई गागर सखि न सहेली चली मैं अकेली घर से मोरपंख सजाऊँगी, साँवरिया रिझाऊँगी मगन मयूर मन मोहन को तरसे अधर धरि मुस्कान, मन में मधुर गान डर नहीं लागे अब विरह के डर […]

कुण्डली/छंद

कुंडलिया छंद

कुण्डलिया छंद:- एक बला की सादगी, दूजे चंचल नैन। दोनों मिलकर लूटते, कर देते बेचैन।। कर देते बेचैन, तुम्हारे बिंदिया, काजल। रुनझुन की झनकार, करे पांवों की पायल।। शब्दों में न समाय, रूपता गृह-कमला की। हिय पर करती राज, सुंदरी एक बला की।। ***************************** कुंडलिया:-   झर-झर झरती चाँदनी, भीगा हरसिंगार। रजनी भीगी नेह से, […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

वक़्त मुझसे लगे खफ़ा सा है. ज़िस्म से जैसे जी जुदा सा है. यूँ तो अरसा हुआ उसे बिछड़े पर वो दिल में कहीं छुपा सा है. मेरे दिन रात महकते हैं यूँ वो तो ख़ुशबू भरी हवा सा है. क्या बताऊँ है पाक वो कितना लब से निकली हुई दुआ सा है. आज फिर […]

लघुकथा

ध्यान- पूजा

साँझ के धुंधलके में.. “ध्यान-पूजा” माँ को मुझसे ज्यादा भैया से लगाव था। किन्तु भाभी ने माँ से कभी ताल-मेल नहीं बिठाया। यह बात भैया भी जानते थे। लेकिन भाभी के जिद्दी व कर्कश स्वभाव के कारण उनसे कभी कुछ नहीं कह पाते। भाभी अपने को आधुनिक ख्यालात का मानती। कुछ समय के अंतराल से […]

गीतिका/ग़ज़ल

गज़ल

गज़ल आस का दीपक जलाया देर तक ख़्वाब दिल को यूँ दिखाया देर तक। बन के आँसू आँख से ग़म बह चला हमने दिल में था छुपाया देर तक। मेरी तन्हाई नहीं देखी गई साथ बैठा मेरा साया देर तक। नूर हर ज़र्रे में कोई भर गया ‘माहे कामिल मुस्कुराया देर तक’ बस गया है […]

क्षणिका

क्षणिकाएँ

‘ ख़त’ ये सूखे हुए पत्ते मुहब्बत भरे ख़त हैं जो कभी लिखे थे बहार ने मौसम के नाम पढ़ लिए, बीत गए रीत गए तो हटा दिए। ******** ‘डायरी’ डायरी के कुछ पन्ने चहकते हैं, महकते हैं और कुछ में है सीलन आँसुओं की कुछ ख़ामोश हैं इंतज़ार में छुअन की कि कोई अहसास […]

गीतिका/ग़ज़ल

गज़ल

अँधेरे जहां के भगाओ जरा दिया प्यार का तुम जलाओ जरा दवा जान के खा गए हम ज़हर जो अब रूठी साँसे मनाओ जरा नहीं जी सके भूल कर हम कभी कहा हमने कब है बताओ जरा लहू पी रही आज इंसान का ये दीवार अब तो ढहाओ जरा रहा है कहाँ धर्म ईमां यहाँ […]

गीतिका/ग़ज़ल

गज़ल

गला के हाड़ अपने खास कुछ सामान जोड़े हैं हकीक़त ने सदा ही खूबसूरत ख़्वाब तोड़े हैं खुला आकाश सर पे है तना धरती बिछौने सी ग़रीबी नाम है जिसका वहाँ सौ रोग थोड़े हैं सितारों की न पाली आरज़ू दिल में कभी हमने उजाले राह से लेके अँधेरे आज मोड़े हैं अँगूठा काट लेंगे […]