कविता

चिहुँकती चिट्ठी

बर्फ़ का कोहरया साड़ी ठंड का देह ढंक लहरा रही है लहरों-सी स्मृतियों के डार पर हिमालय की हवा नदी में चलती नाव का घाव सहलाती हुई होंठ चूमती है चुपचाप क्षितिज वासना के वैश्विक वृक्ष पर वसंत का वस्त्र हटाता हुआ देखता है बात बात में चेतन से निकलती है चेतना की भाप पत्तियाँ […]

कविता

सरसराहट

तिर्रियाँ पकड़ रही हैं गाँव की कच्ची उम्र तितलियों के पीछे दौड़ रही है पकड़ने की इच्छा अबोध बच्चियों का! बच्चें काँचे खेल रहे हैं सामने वृद्ध नीम के डाल पर बैठी है मायूसी और मौन मादा नीलकंठ बहुत दिन बाद दिखी है दो रोज़ पहले मैना दिखी थी इसी डाल पर उदास और इसी […]