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  • कविता : कृषक

    कविता : कृषक

    क्यों न जाती सबकी राह तुम तक क्यों न आती तेरी आह हम तक सीचं सीचं कर धरती , जीवन तू जगाता है बोलो न कृषक तू फिर क्यों यम-दीप जलाता है माना आँखों पर सबके...

  • देखो ! बसंत ऋतू है आई I

    देखो ! बसंत ऋतू है आई I

    लहराता है जब पीत-दल धरा जब ले अंगड़ाई पुलकित होते उपवन जब लेकर मानस की गहराई देखो ! बसंत ऋतू है आई I पिक का कुहू ध्वनि प्रेमियों का हित-वर्धन बना भ्रमर गीत कूजन कर प्रीत...