कविता

मानव के धुप

जिंदगी बेजुबान होती जा रही है, काया लहूलुहान होती जा रही है। मानव के धूप में जिए तो कैसे जिए, मेरी गृहस्थी सुनसान होती जा रही है॥ आए-दिन हंगामा करना मेरा मकसद नहीं, जिंदगी,जिंदगी से लड़े ये मेरा मकसद नहीं। आप जाएं अपने घर को जिंदगी के लिए, मेरी जिंदगी जंजीर में तब्दील होती जा […]

कविता

बेरोजगारी का स्वरुप बिकराल होगा

  हैवानियत की चश्मा जिनके आँखों पर होगा उन्ही लोगो के वजह से मानव शर्मसार होगा भारत में बढती आबादी का स्वरूप बिकराल होगा तो बेरोजगारी की हालत और भी बिकराल होगा। आज जिधर भी देखिये बेरोजगारी ही बेरोजगारी है नमक दाल रोटी चालाने में भी मारा मारी है यही हालात रही तो मौसम भी […]

कविता

बढ़ते चल।

  मानव अपनी पीड़ा खुद व्यक्त करता है जिंदगी में ठोकर खाकर आगे बढ़ता है मत घबरा इतना शांत चले और चल नदी की धरा की तरह आगे बढे चल । पानी की बुँदे गर्म तवा पर छटपटाता है जिद में लिया निर्णय जीवन को हिलाता है परिवार में रिश्तों की अहमियत करते चल रिश्ते […]

गीतिका/ग़ज़ल

क्रांति चलनी चाहिए।

रो रहा है देश मेरा आँसू पोछनी चाहिए देश के अंदर फिर से क्रांति चलनी चाहिए। चारो तरफ लूट मार है और हंगामा बरपने लगी भ्रष्टाचारी के खिलाप एक युद्ध चलनी चाहिए। देश के अंदर फिर से क्रांति की लहर दौड़ने लगी शोषण के विरुद्ध फिर से क्रांति चलनी चाहिए। नेता सब भूल जाते आते […]

कविता

मजदूर

मैं मजदूर हूँ मुझे जिना है इसके भार पर नहीं दुखी हूँ बस चलता हूँ अपनी राह पर। दिन भर दौड़ता हूँ बनाये मानव हाट पर भोजन के राह दौड़ते अपनों के ही आस पर। जिंदगी में काम करता हूँ अपने ही नाज पर दो वक्त की रोटी मिल जाये इसके ही आस पर। शोषण […]

कविता

नव वर्ष।

सृष्टि का आरंभ हुआ था मानव का अवतार हुआ था चैत्र महीना शुक्ल पक्ष का नव वर्ष का शुरुआत हुआ था। ग्रह नक्षत्र सम्बन्ध हुआ था मास हिंदी शुरुआत हुआ था प्रकृति में बदलाव लिये नव वर्ष का शुरुआत हुआ था। पेड़ पौधे फल फूल खिला था मंजर कली प्रादुर्भाव हुआ था वातावरण में उल्लास […]

कविता पद्य साहित्य

कागज दिल

तुम्हारे प्यार में इश्क का नशा जब छाने लगे कागज़ दिल पर तुम्हारा नाम आने लगे। प्यार की गहराई से हुस्न की परछाई तक मेरे होठों पर तेरा नाम आने लगे। तुम्हारे प्यार का नशा कुछ इस तरह से चढ़ा तेरे प्यार में मदहोश होने लगे। तुम्हारे स्पर्श को पूजा था मंदिर की तरह इन […]

गीत/नवगीत

शराबबंदी

घर बन गया मन मंदिर बन गया, शराबबंदी से मेरा संसार बस गया। आता था पिके मारता था हमें दुनियां के भीड़ से डराता था हमें मदिरा एक सामाजिक कलंक बन गया, शराबबंदी …………… मदिरा से हमारे संस्कार चले जातें है विवेक और ज्ञान सदभाव चले जातें है मदिरा से आदमी शैतान बन गया शराबबंदी […]

कविता

कविता – पर्यावरण

चल रहे हम किधर खुद ही नहीं पता है मानव विनाशलीला खुद ही खोद रहा है। चलती है मेरी नैया डुलती है मेरी नैया हम कहाँ बढ़ रहे है खुद ही नहीं पता है मानव………………. चलते है हम आगे देखते नहीं हम पीछे विकास के चक्कर में खुद कब्र खोद रहा है मानव………………. पर्यावरण की […]