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  • मानव के धुप

    मानव के धुप

    जिंदगी बेजुबान होती जा रही है, काया लहूलुहान होती जा रही है। मानव के धूप में जिए तो कैसे जिए, मेरी गृहस्थी सुनसान होती जा रही है॥ आए-दिन हंगामा करना मेरा मकसद नहीं, जिंदगी,जिंदगी से लड़े...


  • बढ़ते चल।

    बढ़ते चल।

      मानव अपनी पीड़ा खुद व्यक्त करता है जिंदगी में ठोकर खाकर आगे बढ़ता है मत घबरा इतना शांत चले और चल नदी की धरा की तरह आगे बढे चल । पानी की बुँदे गर्म तवा...

  • क्रांति चलनी चाहिए।

    क्रांति चलनी चाहिए।

    रो रहा है देश मेरा आँसू पोछनी चाहिए देश के अंदर फिर से क्रांति चलनी चाहिए। चारो तरफ लूट मार है और हंगामा बरपने लगी भ्रष्टाचारी के खिलाप एक युद्ध चलनी चाहिए। देश के अंदर फिर...

  • मजदूर

    मजदूर

    मैं मजदूर हूँ मुझे जिना है इसके भार पर नहीं दुखी हूँ बस चलता हूँ अपनी राह पर। दिन भर दौड़ता हूँ बनाये मानव हाट पर भोजन के राह दौड़ते अपनों के ही आस पर। जिंदगी...

  • नव वर्ष।

    नव वर्ष।

    सृष्टि का आरंभ हुआ था मानव का अवतार हुआ था चैत्र महीना शुक्ल पक्ष का नव वर्ष का शुरुआत हुआ था। ग्रह नक्षत्र सम्बन्ध हुआ था मास हिंदी शुरुआत हुआ था प्रकृति में बदलाव लिये नव...

  • कागज दिल

    कागज दिल

    तुम्हारे प्यार में इश्क का नशा जब छाने लगे कागज़ दिल पर तुम्हारा नाम आने लगे। प्यार की गहराई से हुस्न की परछाई तक मेरे होठों पर तेरा नाम आने लगे। तुम्हारे प्यार का नशा कुछ...

  • शराबबंदी

    शराबबंदी

    घर बन गया मन मंदिर बन गया, शराबबंदी से मेरा संसार बस गया। आता था पिके मारता था हमें दुनियां के भीड़ से डराता था हमें मदिरा एक सामाजिक कलंक बन गया, शराबबंदी …………… मदिरा से...