कविता

श्रापित संपदा

उद्योगीकरण के आँधी में जब बुझने लगती पर्यावरण की बाती तब करने लगती धरती त्राही-त्राही और तब श्राप बनती संपदा किसी स्थान के लिए तब मजबूर होकर पलायन करता हर एक आदमी। उद्योगीकरण की मशाल देखकर बुझने लगती पर्यावरण की बाती और लोगों को गलती समझ न आती। जहाँ बहती थी मिट्टी की खुशबू वहाँ […]

कविता

समय देकर तो देखो

समय देकर तो देखो शायद सब कुछ ठीक हो जाए पुराने-कडवे रिश्तों में शायद थोड़ी-सी मिठास भर आए दुश्मनी की मशाल शायद थोड़ी कम हो जाए भटके हुए को उसका मार्ग मिल जाए समय देकर तो देखो शायद सब कुछ ठीक हो जाए घर में फैली सीलन का कोई ईलाज मिल जाए दो पीढियों के […]

कविता

ज़िंदगी

एक हसीन तोहफा है जिंदगी। फूल बनकर मुस्कुराना, मुस्कुरा कर गम भुलाना है जिंदगी। माँ का प्यार, यारो की यारी है जिंदगी। हार को जीत मे बदलना या नामुमकिन को मुमकिन मे बदलना है जिंदगी। एक वरदान है जिंदगी, एक अरमान है जिंदगी, उस खुदा का एक अहसान है जिंदगी। – श्रीयांश गुप्ता

कविता

सरहद

सरहद कोई लकीर नही है हर दुश्मनी का आगाज़। जहाँ खिंच जाती है यह बन जाती है वहाँ दीवार। दो मुल्कों की दोस्ती को बना देती है बेजान। खून के मिट्ठे रिश्तो को भी चखा देती है नीम का स्वाद। भाईचारे के संदेश को भी चटा देती है यह धूल। इसीलिए… सरहद कोई लकीर नही […]