हास्य व्यंग्य

इ क्रिकिट माया ……!

आज फिर रतनलालजी परेशान हो गये। बोले, “मुझे भी क्रिकेटर बनना है।” मैने समझाया भाई हम जैसै कामकाजियों के पास इतनी फुर्सत कहाँ कि नून रोटी का चिन्तन छोड़ बल्ला भाँजने चलें। भाई बडी मेहनत है, बडी प्रैक्टिस की जरूरत है। अपनी लाल लाल आँखे मटकाते हुये रतन लाल जी बोले, “ससुरा हमको का लोला […]

कविता

इक एहसास……….!!!!!!!

तुम तसव्वुर में हो तस्सव्वुर की तरह, देख के तुम्हें निहाल है तसव्वुर की तरह….! तेरा वो ख़त लिखना, लिफाफे में बंद करना, याद आता है तस्सव्वुर में वो कोरों का भीगना..!! बिन पढ़े ही तेरा ख़त मैं पढ़ ही लेता हूँ, वो ज़ज्बात तूने लिखे जो जज्बातों के तस्सव्वुर में…!!! सोचते हैं कि अब […]

कविता

भविष्य

किसी शाख से ,टूटे पत्ते की तरह – भटकते हैं हम.. दिशाविहीन.. अन्तहीन… लक्ष्य तो है मगर, लक्ष्यहीन… अपनी पहचान पाने की कोशिश में- अहिंसक आन्दोलनोँ की राहोँ में, व्यवस्था की क्रूर लाठी से – या घोड़ों की टापोँ से… जब भी कुचले जाते हैं… बिखरता है निर्दोष खून… कच्ची पक्की सड़कों पर., इस दोष […]

कविता

कमीज़…..!

  मुहब्बत ने मुहब्बत को मुहब्बत से नहीं देखा, फटी कमीज़ तो देखी मगर इंसान नहीं देखा….! सोचता हूँ आज तो हंसी उन्मुक्त आती है, एक कमीज़ भी सूरत इंसान की दिखा जाती है..!! जलाई थी हथेलियां कि उनकी आह तो निकले, जमीं थी जो बर्फ दिल में कि ऐ ! काश वो पिघले..!!! याद […]

कविता

यथार्थ…

भागती है दूर परछाई मेरी मुझसे चाहता हूँ पकड़ना जब भी उसे बोली मुझसे एक दिन – काम हो, तुम्हे छू नहीं सकती . क्रोध हो, तुझे सह नहीं सकती . लोभ हो, तुम्हे पा नहीं सकती . मोह हो, तुम्हे अपना नहीं सकती . तुम आदमी हो, तुझे मैं जी नहीं सकती ……

कविता

घर…

थक के चूर जब भी होता हूँ कभी तेरी यादों की दीवारों से लगके सो जाता हूँ मैं..! अहसासों के झरोखों से घूमती तेरी खुशबु तेरे होने का एहसास कराती मुझको कोई झरोखा न लगाया मैंने..!! कोई आंधी कोई तूफान कई बरसात की रातें तेरे आँचल की छत के तले गुजारी मैंने..!!! तकती आँखें कही […]

कविता

गांव

अक्सर ख्वाब में घर का कुवाँ नजर आता है आजकल मुझे मेरा गांव याद बहुत आता है याद आतें हैँ खेत खलिहान औ चौबारा बरसों बीत गये जहाँ पहुँच न पाये दुबारा याद आता है बरगद का वो पेड़ जहाँ हम छहाँते थे कैसे भूल पाऊँ हाय वो पोखरिया जिसमें हम नहाते थे नहर की […]