धर्म-संस्कृति-अध्यात्मब्लॉग/परिचर्चासामाजिक

इंसान ऐसा भी कर सकता है !

एक इंसान होने के नाते लखनऊ की अति ह्रदय विदारक घटना से इतना शर्मसार हूँ कि अब इस नतीजे पर पहुँचने पर मजबूर हूँ कि कोई इंसान ऐसा भी कर सकता है ? जी, बिलकुल कर सकता है ! एक पुरुष केवल औरत के साथ ही नहीं बल्कि एक पुरुष दुसरे पुरुष के साथ भी ऐसा कुछ अमानवीय, अप्राकृतिक कर सकता है !  इसीलिए अब ऐसी घटनाओं पर एक इंसान ऐसा भी कर सकता है इस वक्तव्य के आगे प्रश्न चिन्ह लगाने की कोई गुंजाइश ही नहीं बची ! क्यूँ  की इस वक्तव्य को लखनौ जैसी घटनाए दोहराने वालों ने नतीजे पर पहुंचा दिया है ! और साथ साथ यह भी साबित कर दिया है की इतनी हैवानियत अब केवल वे इस वजह से  नहीं करते की उनके हाथ लगा इंसान दुसरे धर्म का, दुसरे देश का ,या फिर कोई उनके जैसा ही राक्षस है बल्कि अपने किसी छोटे से अपमान के बदल्रे या केवल उनकी मनमानी को अनसुनी किये जाने की वजह से भी कर सकते हैं  !

व्यक्तिगत स्तर पर जानवरों और शैतानों से भी नीचे गिरता इंसान अब उन सभी बातों के अस्तित्व और उपयोगिता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है जो सदियों से मानव जीवन के ,समाज के कल्याण का दम भरती आयीं है ! ऐसी सारी दुनिया में एकमात्र चीज है और वह है धर्म ! और उनके धर्म ग्रन्थ ! अब आप कहोगे की इसमे धर्म कहाँ से दोषी हो गया ! बिलकुल ऐसी घटनाओं के होने में धर्म कहीं से भी दोषी नहीं है ये तो हम भी मानते हैं ! लेकिन बताइये आखिर ऐसी घटनाओं की जड़ में क्या है ? पुरुषवादी परंपरा या फिर ताकत का घमंड ? और यह सत्य है कि जिसका आप रात दिन गौरव करते नहीं थकते वह धर्म तो इसमे कहीं है ही नहीं ! क्यूँकि हमारे सभी धर्मो के धर्म ग्रंथों में वर्णित बुरे से बुरा विलेन भी लखनौ जैसी घटनाओं को अंजाम देना तो छोडिये इतनी घृणित हद तक सोचता हुवा भी कहीं नजर नही आता !

लेकिन फिर भी ऐसी घटनाओं पर अगर बलात्कारी पराये धर्म का हो तो पहले तो धर्म से जुडी राजनीति की जायेगी और स्वधर्मी हो तो फिर धर्म मुद्दा नहीं बनेगा लेकिन कानून पर गाज गिराई जायेगी ! यह सब  ऐसी ही तरह की अप्रत्यक्ष रूप में की जानेवाली शरीफ लोगों की हैवानियत है ये हम भूल जाते हैं की ऐसी घटना ही धर्म की सर्वथा हार का सबूत है जिसकी दुसरे पर जिम्मेदारी डालना यह इस घटना से भी बड़ा शर्मनाक है !  उस औरत की लुटी हुई इज्जत का किसी पर ठीकरा फोड़कर खुद को पाक साफ़ करार देना सरेआम मजाक है !  और सबसे भयानक बात सब जानते हैं की अकेला कानून कुछ नहीं कर सकता लेकिन जिस धर्म के संस्कारों के बलबूते इंसानियत की रक्षा के लिए बना हर कानून टिका है उसकी हार पर कोई शर्मिंदा नहीं होता उलटे उसे बड़ी सहूलियत से परे रखा जाता है ! या फिर दुसरे धर्म पर कीचड़ उछालने के लिए इस्तमाल किया जाता है ! और फिर खुद ही चिल्लायेंगे की इसे धर्म से मत जोड़ो ! क्यूँ भाई ? क्या हम अधर्मी हैं जो धर्म को इसमे घसीट रहे हैं ?? जब आप धर्म का इस्तमाल कर सकते हो तो हम उसपर सवाल भी न उठायें ? लेकिन सवाल उठाने के बावजूद  हमारी धर्म को इस्तमाल करने की मंशा कतई नही है ! क्यूँ की हम भी मानते हैं की धर्म ऐसी घटनाए होने के लिए जिम्मेदार ना सही लेकिन ऐसी घटनाए होने न देने के लिए जरुर जवाबदेह है ! वरना धर्म के अस्तित्व के कोई मायने ही नहीं रहेंगे !

आखिर ये धर्म रक्षा की दावेदारी के लिए सन्यास ले ले घूमने वाले किस धर्म की रक्षा का सबूत दे रहें हैं ! या सिर्फ खुद के मोक्ष के लिए भटक रहे हैं ! जब तक इंसान कहलाने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसी घटनाओं को अंजाम देता रहेगा तब तक क्या किसी पवित्र से पवित्र ,साधू सन्यासी को भी मोक्ष मिल सकेगा ? क्या मोक्ष देने वाला उसकी सम्पूर्ण मानवजाति के लिए होने वाले उत्तर दाइत्व में असफलता के लिए माफ़ कर देगा ? इसीलिए जब तक ऐसी घटनाओं की जिम्मेदारी दुसरे व्यक्ति या कारणों पर डाल हम इस भुलावे में रहेंगे की इसमे मेरी कोई भूमिका ही नहीं है मैं तो सम्पूर्ण रूप से पाक दामन हूँ! इश्वर का पवित्र भक्त हूँ इसीलिए मुझे तो मुक्ति या विभिन्न धर्मो  ने जो भी मनुष्य जीवन के लिए अंतिम लक्ष्य रखा है उसकी सहज प्राप्ति हो जायेगी तब तक ऐसे अमानवीय खेल होते रहेंगे !

इसीलिए आज जिस तरह हमारी भौतिक विरासत की रक्षा के लिए हमारे सैनिकों को प्रत्यक्ष सीमा की लड़ाई से ज्यादा सीमा के अन्दर की अप्रत्यक्ष चुनौतियों से लड़ने का समय आ गया है उसी तरह हमारे सभी धर्म के मानवीय संस्कारों के रक्षकों को अब संन्यास ,सत्संग, होम हवन, पूजा पाठ के समकक्ष सभी प्रत्यक्ष धर्मरक्षा के लिए प्रतीत होने वाले कार्यों या कर्मकांडों से ज्यादा इंसान के रूप में जी रहे हर एक जीव तक पहुँच कर उस तक धर्म के वह संस्कार जो कथित धर्म से ज्यादा वास्तविक और सर्वमान्य मानवता की रक्षा करें उन्हें उस जीव द्वारा प्रत्यक्ष अमल में लाने तक की तपस्या में जुट जाना किसी भी घोरी अघोरी ,हिमालय या श्मशान में की जा रही तपस्या से अधिक वह फल देगा जो मृत्यु उपरांत भी हमें खुदगर्जी का पाठ पढ़ाने वाले धर्म ग्रंथों के फल से सर्वथा अलग और सार्थक होगा  तथा सम्पूर्ण मानव जाती के प्रत्यक्ष जीवन में प्रत्यक्ष धर्म की स्थापना का केवल मानव ही नहीं अपितु हर जीव को जीते जी साक्षात्कार करवाएगा !

आखिर सभी धर्म भी तो यही मानते न की इश्वर उसी को मिलते हैं जिसने आजीवन धर्म का प्रचार किया हो ! लेकिन इश्वर के प्राप्ति की खुदगर्जी के लिए ही सही अगर आपके धर्म प्रसार के साथ साथ आपके कार्यों से  धर्म का  मनुष्यों को होनेवाला प्रत्यक्ष लाभ भी अगर इश्वर देख पाए तो आपको इश्वर की प्राप्ति के साथ विशेष अनुकम्पा की भी फलप्राप्ति हो सकती है ! भला आपके मानव जीवन हितकारी कार्यों से इश्वर प्रसन्न नहीं होंगे ऐसा कौन सा धर्म कहता है ? फिर यह जब किसी कथित धार्मिक कार्यों से होता नजर नहीं आ रहा तो क्यूँ न इसके लिए नए रास्तों की तलाश की जाए !!

धन्यवाद

परिणिति :-
असल में हमारी आदत नहीं बनी है की उन सभी दावेदारों को कटघरे में खड़ा करे जो ऐसी हैवानियत से हमें बचाने का सदियों से दावा करते आये हैं ! हमें आदत है सिर्फ उनकी जवाबदेही तय करने की जो इंसान की बनाई व्यवस्था है पुलिस और प्रशासन जिसका सिमित होना स्वाभाविक है ! क्यूँ की अंत में वह इंसान द्वारा ही बनाई गई है लेकिन जैसा की सभी धर्म प्रेमी मानते हैं धर्म एक इश्वर द्वारा स्थापित व्यवस्था है क्या आप बता सकते हैं की इस धर्म का , ईश्वरीय व्यवस्था का ऐसा क्या उद्दिष्ट है जिसकी प्रतिष्ठा के लिए हम एक दुसरे के साथ इस बलात्कारी की ही तरह हैवानियत पर उतर आने से भी परहेज नहीं करते ! क्या दावा करता है आपका धर्म ? आखिर क्या हासिल करने के लिए हर धर्म के धार्मिक अपने अपने धर्म को श्रेष्ठ साबित करने पर तुले होते हैं ? इसमे हर धर्म में कहीं न कहीं मृत्यु उपरांत कुछ हासिल करने की समानता को देखें तो भी क्या उसे हासिल करने के लिए भी वह धर्म क्या आपको आपके इंसानी जीवन में कदम कदम पर किसी न किसी तरीके से मानवता के रास्ते पर ही चलने की हिदायतें नहीं देता ? बिलकुल देता है ! इसीलिए हम भी नहीं कह रहे की ऐसी घटनाएँ होने के लिए धर्म जिम्मेदार है लेकिन धर्म के इतने जानलेवा समर्थकों के, अनुयाइयों के होते हुवे भी अगर ऐसा हो रहा है तो धर्म के होने की उपयोगिता पर जरुर सवाल उठेगा ? क्यूँ ऐसी हैवानियत न होने के लिए धर्म जरुर जवाब देह है ! जिसे आजतक आप छत कहते आये उसीके निचे आपको दिन रात जागकर जीना पड़े और जरा आँख लगी की सीधे जान माल के नुकसान का भय हो तो ऐसी छत को आप छत कहोगे ?

अगर आपको धर्म से जुड़े मोक्ष संन्यास फल संस्कार का इससे जोड़ना समझ नहीं आया तो चलिय समझा देते हैं ! ये जो मोक्ष संन्यास आदि धर्म से ही जुड़े हैं ये तो मानते हो न ? फिर धर्म किसके लिए है ? केवल मृत्यु उपरांत जीवन या जो भी कल्पना है उसके लिए ?? या सशरीर जीवन के लिए भी धर्म की कोई भूमिका है ? अगर आप एक धर्म प्रेमी होने के नाते भी देखे तो दोनों जीवन को सार्थक बनाने के लिए धर्म की जो भूमिका है उसका अंतिम लक्ष्य में भले ही मृत्य के बाद के जीवन को अधिक महत्व दिया सा लगता है लेकिन असल मकसद सशरीर जीवन को मानवीय बनाना है यह बात आप की तरह कई धर्म धुरंधरों को समझ में नहीं आती और वे असल साध्य को छोड़ केवल मोक्ष प्राप्ति , संन्यास ,तपस्या, संस्कार आदि साधनों को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेते हैं ! और उसी में सारा जीवन लगा देने के बावजूद असल साध्य सशरीर जीवन को मानवीय बनाने में उनका योगदान शून्य ही साबित होता है ! और भी सीधे और सरल भाषा में कहूँ तो संन्यास आदि ले केवल जंगल में भटकने से ,समाज से दूर एकांत में तपस्या करने , चोला पहन केवल गाँव गाँव घूम पारायण , ईश्वरीय सन्देश , सत्संग , सामूहिक नमाज आदि सब करने से तो अच्छा है की कोई जीवन भर केवल इसलिए एकांत और बेवक्त घुम किसी अबला की इज्जत लुटने से बचा सके, धार्मिक सभाओं में कर्मकाण्डो और अपने धर्म के इश्वर को ही श्रेष्ठ साबित करने वाले कोरे भाषणों की जगह हम डोअर टू डोअर जाकर इंसानी रिश्तों को ही श्रेष्ठ साबित करने ले लग जाएँ ! बजाय इस कोशिश के की वह उसके धर्म के इश्वर से ज्यादा अपने धर्म के इश्वर को माने अगर हम ये कोशिश करें की वह किसी भी धर्म के इश्वर से ज्यादा एक स्त्री और एक पुरुष के रिश्ते की पवित्रता को माने तो भी उसे वह सब कुछ प्राप्त हो जाएगा जो धर्म ने पाने को कहा है !! क्या इस बात से कोई असहमत हो सकता है ?

सचिन परदेशी

संगीत शिक्षक के रूप में कार्यरत. संगीत रचनाओं के साथ में कविताएं एवं गीत लिखता हूं. बच्चों की छुपी प्रतिभा को पहचान कर उसे बाहर लाने में माहिर हूं.बच्चों की मासूमियत से जुड़ा हूं इसीलिए ... समाज के लोगों की विचारधारा की पार्श्वभूमि को जानकार उससे हमारे आनेवाली पीढ़ी के लिए वे क्या परोसने जा रहे हैं यही जानने की कोशिश में हूं.

6 thoughts on “इंसान ऐसा भी कर सकता है !

  • जगदीश सोनकर

    उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में घटी यह घटना इंसानियत पर धब्बा है. उस पर पुलिस की कार्यवाही तो और भी शर्मनाक है. आपका लेख ठीक है, पर धर्म का कोई दोष नहीं. यह शिक्षा की कमी है.

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    सचिन जी , आप का लेख बहुत बढिया है . कुछ वर्षों से यह जो इंसान की बुधि भ्रष्ट नज़र आ रही है धर्म से इस का कोई लेना देना नहीं है . यह समय की हवा ही ऐसी पर्दुश्त हो गई है कि हर देश में ऐसा हो रहा है , किसी में कम किसी में ज़िआदा . दूसरी बात से मैं आप से बिलकुल सहमत हूँ कि धर्म ने अपना अच्छा पार्ट अदा नहीं किया बल्कि बुरा ही किया . दुनीआं में जितने भी धर्म बने हैं वोह इंसान को सही दिशा दिखाने लिए ही बने थे . लेकिन इन का फैदा होने की बजाए नुक्सान ज़िआदा हुआ . भगवान् को मानना या ना मानना अपनी चौएस है लेकिन जब यह एक ग्रुप की शकल बन जाती है तो वोही भगवान् को मानने वाला पुर्ष दुसरे ग्रुप से नफरत करने लगता है . फिर कुछ हुशिआर लोग अपने अपने कर्म काण्ड बना कर लोगों पर थोप देते हैं किओंकि इस में उन्हें आर्थिक लाभ होता है . हर देश में हकूमत है . पक्ष विपक्ष हैं . जब पक्ष कोई कानून बनाता है तो विपक्ष सवाल करता है उस को गलत साबत करने की कोशिश करता है लेकिन धर्म में ऐसा होता ही नहीं . जो भी धर्मगुरु कह देता है उस को मानना ही पड़ता है , कोई आवाज़ उठाने की कोशिश करता है तो उसे बुरा समझा जाता है . कितने धर्म गुरु किसी ना किसी अपराध में पकडे गए ? पहले सब लोग हाथ जोड़ कर भगवान् का नाम लेते थे , अब वोही लोग नफरत की नज़र से देखते हैं . सती की रसम किस ने शुरू की ? किसी धर्म गुरु ने ही तो . बाल विधवा विवाह किस ने रोका ? किसी धर्म गुरु ने ही तो . किया यह धर्म है . एक मुसलमान मंदिर को नफरत करता है , हिन्दू मस्जिद को देखना नहीं चाहता . तो धर्म कहाँ हुआ ? हिटलर ने ६ मिलियन जिउज़ मार दिए . क्रिस्चियन क्रूसेडर लोगों ने मुसलमानों को मारा , मुसलमानों ने हिन्दुओं को मारा . तो धर्म ने किया फैदा पौह्न्चाया इंसान को ? इस से यह अच्छा नहीं कि समाज सेवी संस्थाएं हों जो लोगों की भलाई के लिए सोचें . हर मैम्बर उस में योगदान दे. एक बात पर ही जोर लगाते रहना , पूजा करो पूजा करो , अगले जनम के बारे में सोचो . ओ भाई यह जनम तो सुधार लो , अगला जनम खुद ही संवर जाएगा . सचिन जी , आप के लेख ने मुझे रोष में ला खड़ा किया .

    • सचिन परदेशी

      आपका ह्रदय से धन्यवाद ! आप जैसे मेरे से दुगने जीवनानुभव रखने वाले मेरे पितृतुल्य व्यक्ति का मेरे विचारों से सहमत होना मेरे लिए निश्चित ही आजीवन हर्ष का कारण रहेगा और आपकी इस विचारणीय टिपण्णी से मुझे भी और उन लोगों को भी जवाब मिला है जो मुझे धर्म विरोधी समझने गलतफहमी पैदा करते हैं , खुद में भी और मुझ में भी ! धन्यवाद एवं प्रणाम गुरमेल सिंह जी !!

  • विजय कुमार सिंघल

    आचार्य जी, इस जघन्य घटना पर आपका रोष उचित है, हम सभी इससे व्यथित हैं और आक्रोशित हैं. लेकिन आपने इस घटना के लिए धर्म को जिम्मेदार ठहराया है. कहना पड़ेगा कि आपने गलत जगह अपना गुस्सा उतारा है. आजकल हर बात के लिए धर्म को जिम्मेदार ठहराने का फैशन हो गुआ है. आपने भी वही किया है, बिना इसके सही कारणों की पड़ताल किये.
    मेरे विचार से इसके लिए मानसिक प्रदूषण जिम्मेदार है, जो नारी को भोग की वस्तु समझता है और उसे पाने के लिए कोई भी अपराध कर गुजरता है. इस प्रदूषण को फ़ैलाने में ‘आधुनिक सभ्यता’ और उससे जनित वातावरण ही जिम्मेदार है. धर्म तो सदा से ही इस देश और समाज का प्रमुख अंग रहा है, लेकिन पहले ऐसी जघन्य घटनाएँ देखने में नहीं आती थीं. अगर वैसी कोई घटना होती भी थी, तो अपराधी को सामाजिक बहिष्कार सहित कठोरतम दंड दिया जाता था.
    यह मानसिक प्रदूषण कैसे फैला और कैसे सही होगा इस बात पर विचार कीजिये.

    • सचिन परदेशी

      विजयजी टिपण्णी के लिए धन्यवाद ! आपके लिए लेख ,में ही जवाब जोड़ दिया है !

      • विजय कुमार सिंघल

        आपने लेख में जो दो नए पैरा जोड़े हैं, उनमें धर्म और मोक्ष का ही जिक्र किया है. मेरी बात का कोई उत्तर नहीं दिया.

Comments are closed.