कविता

उड़ना आसान नहीं…

एक चूजा था
जो अभी निकला नहीं था अंडे से
आतुर था वो आसमान में उड़ने को
अंडा बहुत शख्त था
उसे फोड़ना तो प्रकृति का काम था
पर वो दुराग्रही चूजा
अपनी चोंच को बार-बार मारता
अंडे की खोल पर
उसे इन्तजार नहीं करना था
अपनी माँ की गर्माहट का
जो उसे परिपक्व करती
पर वो कच्चा ही बाहर आने की ठान चूका था
उसका काम कर दिया था एक दुष्ट प्रकृति के कौव्वे ने
अंडा तो फूटा
अपने साथ लाया काल रूपी कौव्वे को
चूजा जो सोच रहा था
अंडे के बंधन से मुक्ति मिले और
मैं उडूगा मुक्त गगन में
अब उसकी जान पर बन आयी थी
पंख उड़ने लायक नहीं थे
पांवों में बल तो पड़ा ही न था
आवाज तो थी ही नहीं
जिससे अपने भाव किसी को बता पाता
दुष्ट कौव्वा उसे ले उड़ा
न जाने किस पेड़ की टहनी पर
समय से पहले उड़ने का उतावलापन ले डूबा
कुछ ऐसा ही हो रहा है
आज के युवाओं के साथ
जो भागना चाहते हैं
अंधी दौड़ में
और जगह जगह खड़े है
कव्वे से दुष्ट लोग
घात लगाकर
भौतिकतावाद का जाल बिछाए बैठे हैं
आखिर फँस ही जाते हैं
चमचमाते जाल में
बहेलिये बहुरूपिये है यहाँ
बाजार के दलाल भी यही लोग हैं
फंसता अनुभव हीन
चौधियाया हुआ युवा
उस चूजे की तरह
जो समय से पहले निकल गया था
अपने अंडे से

डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय ‘प्रतीक’

डॉ. गिरीश चन्द्र पाण्डेय 'प्रतीक'

पिथोरागढ़ उत्तराखंड

One thought on “उड़ना आसान नहीं…

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत उत्कृष्ट कविता ! वाह वाह !!

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