कविता

दो बूंद अश्रु

बस दो बूंद अश्रु के
मेरी आंखों से भी बहेंगे
छिन गये घर के चिराग जिनके
उनके गम को क्या कहेंगे

sसीने पर पडा पत्थर हैं
नीत झर – झर नीर बहेंगे
सूना आंगन सूनी कोख
किस पर ममता नेह भरेंगे

मां बिलखे बाबा निढाल
कैसे अब लाल बिन रहेंगे
छिन गये सहारे जिनके
कैसे खाली मन धीर धरेंगे

लुट गये सुहाग जिनके
वही हृदय यह पीर सहेंगे
राष्ट्र रक्षा की खातिर
जिन वीरों ने प्राण गवाए

उन वीरों को शत शत नमन करेंगे
बस दो बूंद अश्रु के….
मेरी आंखो से भी बहेंगे

मधुर परिहार

2 thoughts on “दो बूंद अश्रु

  • विजय कुमार सिंघल

    मार्मिक कविता !

  • कविता पड़ कर मज़ा आ गिया , किया बोल हैं.

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