कविता

गीत – बुलबुले  

बुलबुले से क्यों हमारे

पल खुशी के हो गये

 

फूट जाते हैं अचानक

बिन किसी आवाज के

छोड़ते कोई निशां भी ना

कभी आगाज के

कुछ पता चलता नहीं

किस खोह में वो खो गये

 

देख पाते बस हवाओं में

उन्हें उड़ते हुए

है मना छूना भले रहना

पड़े कुढ़ते हुए

खीज में कईबार उनसे

मोड़ मुँह हम सो गये

 

रंग भी वैसे लिए जो

रंग कुछ पाते नहीं

मस्त हैं फरमाइशोंपर

पास में आते नहीं

खालीपन के बीज नये

हरबार जुल्मी बो गये

 

*कुमार गौरव अजीतेन्दु

शिक्षा - स्नातक, कार्यक्षेत्र - स्वतंत्र लेखन, साहित्य लिखने-पढने में रुचि, एक एकल हाइकु संकलन "मुक्त उड़ान", चार संयुक्त कविता संकलन "पावनी, त्रिसुगंधि, काव्यशाला व काव्यसुगंध" तथा एक संयुक्त लघुकथा संकलन "सृजन सागर" प्रकाशित, इसके अलावा नियमित रूप से विभिन्न प्रिंट और अंतरजाल पत्र-पत्रिकाओंपर रचनाओं का प्रकाशन

2 thoughts on “गीत – बुलबुले  

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    बहुत अच्छी कविता है.

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत सुंदर गीत ! ख़ुशियों के पल वास्तव में क्षणिक होते हैं या मालूम पड़ते हैं !

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