कविता

हम तुम्हारी ही परछाई है

अर्धांगनी है तुम्हारी
तुम्हारे साथ ही जीना-मरना है
हम तुम्हारी ही परछाई है
परछाई की तरह ही साथ रहना है
जब जब तुम लड़खड़ा कर गिरोंगे
बढ़कर हम थाम लेंगे तुम्हें
जो तुम देख नहीं पाओंगे
वो चीज भी दिखायेंगे तुम्हें,
भटक गए यदि कही दो राहें पर
तो मंजिल का पता बताएगें तुम्हें,
जब कभी तुम हमें आवाज दें पुकारोंगे
सब कुछ छोड़ पास तुम्हारें दौड़े आएगें
जब जब तुम संकट में होंगे
वादा है हमारा हम साथ ही होंगे तुम्हारें ,
पर एक प्रार्थना है हमारी तुमसे
हमें अपने दिल में यू ही बसायें रखना ,
प्यार करते हो तुम जितना हमसे सनम
उसे यूँ ही सदैव हृदय में बनायें रखना |
+++++ सविता मिश्रा +++++

*सविता मिश्रा

श्रीमती हीरा देवी और पिता श्री शेषमणि तिवारी की चार बेटो में अकेली बिटिया हैं हम | पिता की पुलिस की नौकरी के कारन बंजारों की तरह भटकना पड़ा | अंत में इलाहाबाद में स्थायी निवास बना | अब वर्तमान में आगरा में अपना पड़ाव हैं क्योकि पति देवेन्द्र नाथ मिश्र भी उसी विभाग से सम्बध्द हैं | हम साधारण गृहणी हैं जो मन में भाव घुमड़ते है उन्हें कलम बद्द्ध कर लेते है| क्योकि वह विचार जब तक बोले, लिखे ना दिमाग में उथलपुथल मचाते रहते हैं | बस कह लीजिये लिखना हमारा शौक है| जहाँ तक याद है कक्षा ६-७ से लिखना आरम्भ हुआ ...पर शादी के बाद पति के कहने पर सारे ढूढ कर एक डायरी में लिखे | बीच में दस साल लगभग लिखना छोड़ भी दिए थे क्योकि बच्चे और पति में ही समय खो सा गया था | पहली कविता पति जहाँ नौकरी करते थे वहीं की पत्रिका में छपी| छपने पर लगा सच में कलम चलती है तो थोड़ा और लिखने के प्रति सचेत हो गये थे| दूबारा लेखनी पकड़ने में सबसे बड़ा योगदान फेसबुक का हैं| फिर यहाँ कई पत्रिका -बेब पत्रिका अंजुम, करुणावती, युवा सुघोष, इण्डिया हेल्पलाइन, मनमीत, रचनाकार और अवधि समाचार में छपा....|

2 thoughts on “हम तुम्हारी ही परछाई है

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    बस यही सुख भरी जिंदगी जीने का राज़ है.

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत अच्छी कविता, बहिन जी.

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