गीतिका/ग़ज़ल

सब कर्मो के फल मिलते हैं

सब   कर्मो  के  फल  मिलते हैं

इसीलिए  बस  छल  मिलते  हैं

 

मिलकर  भी  बस  एक  बचेगा

कब अग्नि और जल मिलते हैं

 

केवल  मृग-तृष्णा  है  वह बस

जब  नभ और थल मिलते हैं

 

अनुरंजन  बस  अभिलाषा  है

जहाँ  स्मृति के पल मिलते हैं

 

कुछ उत्तर हैं सरल बहुत पर

कब  प्रश्नों  के  हल मिलते हैं

 

अभिवृत | कर्णावती | गुजरात

4 thoughts on “सब कर्मो के फल मिलते हैं

  • जवाहर लाल सिंह

    बहुत ही सुन्दर गजल! महोदय आपका अभिनन्दन!

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत सुंदर ग़ज़ल !

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