गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका – कभी मोदी, कभी भुट्टो रहे हैं

जहाँ भी बीज दिल के बो रहे हैं।
वहींपर कैद सपने हो रहे हैं।

थमाने को गये पतवार जिनको,
सुना वो मुद्दतों से सो रहे हैं।

अगर हँसते तो गुलशन सूख जाता,
हवा में टँग तभी तो रो रहे हैं।

जमाने को दिखाना है बहुत कुछ,
नहीं बस जिन्दगी को ढो रहे हैं।

कहाँ चल पा रही है दूरियों की,
हमें खोना है जिनमें, खो रहे हैं।

न एक किरदार में अब काम चलना,
कभी मोदी, कभी भुट्टो रहे हैं।

*कुमार गौरव अजीतेन्दु

शिक्षा - स्नातक, कार्यक्षेत्र - स्वतंत्र लेखन, साहित्य लिखने-पढने में रुचि, एक एकल हाइकु संकलन "मुक्त उड़ान", चार संयुक्त कविता संकलन "पावनी, त्रिसुगंधि, काव्यशाला व काव्यसुगंध" तथा एक संयुक्त लघुकथा संकलन "सृजन सागर" प्रकाशित, इसके अलावा नियमित रूप से विभिन्न प्रिंट और अंतरजाल पत्र-पत्रिकाओंपर रचनाओं का प्रकाशन

2 thoughts on “गीतिका – कभी मोदी, कभी भुट्टो रहे हैं

  • विजय कुमार सिंघल

    ग़ज़ल अच्छी है, लेकिन आख़िरी शेर का भाव समझमें नहीं आया।

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