कहानी

आत्महत्या: अनन्त संभावनाओं का क्षेत्र

पिछले दिनों हरियाणा के एक मंत्री महोदय ने आत्महत्या करने वालों को कायर बता दिया. उसके बाद हमारे किसान-प्रेमी और सेक्युलर मित्र जिस बुरी तरह बेचारे मंत्री जी पर टूटे, उसने मुझे आत्महत्या और कायरता के सम्बंधों पर नये सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया.

इस विषय पर विशेष जानकारी और नामी-गिरामी पुस्तकें उपलब्ध न होने के कारण कुछ अधिक सोच न सका, और कुछ आत्महत्या-विशेषज्ञों से सलाह-मशविरा करने के लिये निकल पड़ा. सबसे पहले मैंने अपने एक पुराने मित्र से मिलने का निश्चय किया, जो मेरी जानकारी में तीन बार आत्महत्या का प्रयास कर चुके थे, और कहने की ज़रूरत नहीं-हर बार असफल रहे थे. पहली बार किशोरावस्था में आत्महत्या का प्रयास उन्होंने तब किया था, जब वह हाई स्कूल के इम्तहान में दूसरी बार फेल हो गये थे. उसके एक साल बाद ही उन्होंने आत्महत्या का दूसरा प्रयास तब किया, जब उनके दकियानूस पिता ने पड़ोसी की उनकी हमउम्र लड़की से शादी करने के उनके मौलिक अधिकार को मान्यता न देते हुए उनकी सार्वजनिक पिटाई की, और तीसरा प्रयास जिसके बारे में मेरे पास निश्चित जानकारी तो नहीं थी, पर सुना था कि पत्नी के उलाहनों से दुःखी होकर अभी कुछ दिनों पूर्व ही उन्होंने एक बार फिर मरने की कोशिश की थी. आनन-फानन में मैंने मित्र को फोन लगाया और शाम को एक पार्क में मिलने का सुझाव उनके विचारार्थ प्रस्तुत किया, जो थोड़ी हील-हुज्जत के बाद स्वीकार हो गया.

मैं समय से पहले पार्क में पहुँच कर मित्र का इंतज़ार कर रहा था कि मित्र प्रकट हुए. मैंने उनका स्वागत मुस्करा कर करने की सोची, पर उनकी गंभीर मुख-मुद्रा देखकर मुझे मुस्कराहट को बीच में ही रोकना पड़ा. मैंने भी उनकी तरह ही गंभीर होने की कोशिश करते हुए कहा: “आप आज भी वक्त के पाबंद हैं”.

तारीफ सुनकर मित्र थोड़ा हल्के ज़रूर हुए, पर उन्होंने मुस्कराने की कोई कोशिश नहीं की.

“मैं आजकल किसी से मिलता-जुलता नहीं, पर तुम्हारा फोन आया तो मैं मना नहीं कर सका”. उन्होंने कहा.

“ऐसा क्या हो गया?” मैंने पूछा.

“सभी लोग  मेरी आत्महत्याओं के किस्से सुनकर मज़े लेते हैं, और मौका मिलते ही उपदेश देने लगते हैं कि आत्महत्या करना बुरी बात है. उन्होंने तल्खी से कहा. “अगर तुम भी मुझे उपदेश देना चाहते हो, तो मैं चला.”

उनके उखड़ते हुए मूड को देखते हुए मैंने जल्दी से मुख्य मुद्दे पर आना ही उचित समझा: “मैं भला आपको क्या उपदेश दे सकता हूँ? मैं तो उल्टा कुछ सीखने-समझने आया हूँ. यह हरियाणे के मंत्रीजी ने जो आत्महत्या करने वालों को कायर बताया है, उस पर आपके क्या विचार हैं?”

“बेवक़ूफ़ है मंत्री! कभी इनके बाप ने भी आत्महत्या की हो, तब तो पता चले. आत्महत्या से बड़ा बहादुरी का काम कोई दूसरा नहीं”

“अच्छा! वह कैसे?” मैंने आँख़ें फाड़ते हुए पूछा.

मित्र कुछ देर तक शायद यह सोचते रहे कि इस मूर्ख को कैसे समझाया जाय. फिर लगभग खीजते हुए उन्होंने कहा: “अच्छा तुम्हीं बताओ, किसी समाज में कायरों की संख्या ज्यादा होती है या बहादुरों की? तुम्हारा मतलब है कि यह जो लोग कीड़ों-मकोडों से भी बदतर ज़िंदगी जिये जा रहे हैं, यह सब बड़े बहादुर हैं? अगर इतने ही बहादुर थे तो बार-बार मुसलमानों और अंग्रेज़ों से हारते क्यों रहे? सब साले मरने से डरते हैं, और इसको बहादुरी समझते हैं. अपनी जान लेना क्या कोई हँसी-ठट्ठा है? कोई कर के तो दिखाये!”

“पर बन्धु, आप भी तो न कर सके” मैंने-डरते-डरते कहा.

“क्योंकि मैं कायर था और हूँ. घर में बाप और स्कूल में मास्टर जानवरों की तरह पीटते थे. रोज़ाना बिना नागा उनकी मार खाने में कौन सी बहादुरी थी? हाई स्कूल पास होना मेरे बस का था नहीं. पहली बार फेल होने पर घर में जो पिटाई हुई, उसे याद करके मैंने फिर से बुरी तरह न पिटने के लिये नदी में छलाँग लगा दी तो क्या मैं बेवक़ूफ़ था? उन्होंने तैश में आते हुए कहा.

“पर गुरु, बात तो कायरता की हो रही थी, बेवक़ूफी की नहीं”

“वही तो मैं बता रहा था; दुबारा फेल होने के बाद मैंने कायरों की तरह चुपचाप मार खाने के बजाय आत्महत्या का वीरतापूर्ण निर्णय लिया, और नदी में छलाँग लगा दी.” इतना कहकर वह थोड़ी देर रुके, फिर अपने-आप ही कहने लगे:”गहरे पानी में जब मैंने गोता लगाया, तब कुछ देर तक तो साँस नहीं लिया, पर जब साँस के साथ पानी फेफड़ों में घुसा, तो मुझे लगा जैसे मेरे फेफडे फट जायेंगे. बस उसी दर्द को बर्दाश्त न कर पाने के कारण कायरता मेरे ऊपर हावी हो गयी, और मैं ऊपर आ गया. बदकिस्मती से तैरना मैंने बहुत छुटपन में ही सीख लिया था.”

हम जैसे कितने लोग हैं, जो आत्महत्या का वीरतापूर्ण फैसला तो कर डालते हैं, पर मृत्यु के समय होने वाली पीड़ा से डर जाते हैं, और फिर से जीने का कायरतापूर्ण निर्णय ले लेते हैं.”

मित्र द्वारा रखे गये इस अभिनव विचार से मेरे ज्ञान-चक्षु चौंधिया गये.

मित्र मेरी हालत का मज़ा लेते रहे और कहते रहे: “मेरी तरह ही कितने लोग आत्महत्या करने का बहादुरी भरा फैसला कर तो लेते हैं, पर जब उन्हें थोड़ा सा कष्ट होता है, जिसे कुछ सेकंड मात्र झेल ले जाने के बाद वह सभी कष्टों से परे निकल जाते, उनके भीतर का कायर उन्हें फिर से गधों, घोड़ों और बैलों की ज़िंदगी जीने के लिये मजबूर कर देता है.”

मेरे दिमाग की नसें तन गयी थीं, और आँखें इस सीमा तक फट चुकी थीं कि उनके बाहर निकलने का खतरा महसूस होने लगा. मैं मित्र के आत्महत्या के क्षणों को जी रहा था; खोपडी का फ्यूज़ उड़ने ही वाला था कि मित्र शायद वातावरण को थोड़ा हल्का करने के उद्देश्य से विषय बदल कर बुद्धिजीवियों के प्रिय विषय अर्थात गवर्नमेंट की नालायकी पर आ गये. उन्होंने कहना शुरु किया: “अपनी गवर्नमेंट भी निकम्मी है. बे-मतलब आबादी, गरीबी और बेरोजगारी का ढिंढोरा पीटती रहती है, और इन सब समस्याओं को हल करने का जो सीधा तरीका है उधर ध्यान नहीं देती.”

“वह कौन सा तरीका है गुरु?” मैंने चकित होते हुए पूछा.

“आत्महत्या एक अपार संभावनाओं वाला क्षेत्र है. मेरा ख्याल है हर आदमी ज़िंदगी में कम से कम एक बार तो आत्महत्या करने की ज़रूर सोचता है. सरकार को बस उसी क्षण को भुनाना है. आदमी के दिमाग में जब आत्महत्या का विचार आता है, तब वह बुरी तरह कन्फ्यूज़ हो जाता है; उसे सलाह देने वाला कोई नहीं मिलता. इसके अलावा मृत्यु के समय होने वाले कष्ट की बातों से भी उसका हौसला टूटने लगता है. ऐसे में अगर सरकार की तरफ से कोई डिपार्टमेंट हो, जो आत्महत्या के इच्छुक व्यक्ति को सही सलाह दे, जिससे वह अपेक्षाकृत कष्टहीन मौत मर सके, तो देश की बहुत बड़ी आबादी आत्महत्या कर लेगी, और जनसंख्या और बेरोजगारी जैसी समस्याएं अपने-आप हल होने लगेंगी. सरकार को पहले तो आत्महत्या के लिये एक अलग मंत्रालय खोलना चाहिये; हर ज़िले और ब्लॉक में जिसके अधिकारी हों; आत्महत्या का इच्छुक व्यक्ति उस अधिकारी के पास जाय और अधिकारी उससे कांसेंट फॉर्म वगैरह भरवा कर एक साइनाइड की गोली दे, जिसे खाकर व्यक्ति तुरंत मर जाय. हाँ, धर्मभीरु हिन्दुओं के लिये अंतिम संस्कार वगैरह की व्यवस्था भी मुफ्त होनी चाहिये.”

देश की सभी समस्याओं को इतनी आसानी से हल करने की मित्र की योजना सुनकर उनके प्रति मैं श्रद्धावनत हो उठा. जिस आदमी को योजना-आयोग में होना चाहिये था, वह एक प्राइवेट फ़र्म में धक्के खा रहा था. उनको अतिरिक्त आदर से देखते हुए मैंने उनसे वह सवाल किया जो योजना/ नीति आयोग के सदस्य से ही पूछा जाना चाहिये:

“किसान इतनी बड़ी संख्या में आत्महत्या क्यों कर रहे हैं?”

“बकवास है!” उन्होंने उत्तेजित होते हुए कहा. “इस देश के किसान इतने हिम्मती कब से हो गये कि आत्महत्या जैसे वीरोचित कार्य करने लगें? सब मीडिया वालों का खेल है. कहीं किसी किसान की आत्महत्या की सूचना मिलते ही यह सब वहाँ पहुँच जाते हैं, और मामले को तब तक उछालने में लग जाते हैं जब तक सरकार का कोई मंत्री उस पर बयान न दे दे. विपक्षी नेताओं को भी यह सूट करता है. उन्हें खुद को किसानों का हमदर्द साबित करने का मौका जो मिल जाता है. मैं शर्त लगाने को तैयार हूँ कि किसानों से कहीं ज्यादा संख्या में प्रेमी-जोड़े माँ-बाप की ज्यादतियों के कारण आत्महत्या करते हैं, पर उनकी आत्महत्या खबर नहीं बनती. प्रेम में असफल होना किसी की ज़िंदगी की सबसे बड़ी ट्रैज़ेडी होती है, और जो इस ट्रैज़ेडी के बाद आत्महत्या नहीं कर सकता, वह फसल खराब होने पर क्या खाक करेगा?”

“प्रेम के चक्कर में आपने भी तो आत्महत्या का एक प्रयास किया था?” मैंने उन्हें कुरेदा: “इस बार क्या हुआ?”

“इस बार?” वह खो से गये मानो तय न कर पा रहे हों कि यह किस्सा मुझे बताया जाय या नहीं. कुछ देर सोचने के बाद सर को एक झटका देते हुए उन्होंने कहना शुरू किया:

“इस बार मैंने ट्रेन से कट कर जान देने की सोची, और रेलवे लाइन पकड कर शहर से दूर जा पहुँचा. रेलवे लाइन के आस-पास टहलते हुए मैं ट्रेन के आने का इंतज़ार कर रहा था और अपना कलेजा मजबूत कर रहा था कि चाहे कुछ भी हो जाय, मैं इस बार नहीं भागूँगा, पर तभी——”

“तभी क्या हुआ?” उत्सुकता को दबाने में असमर्थ मैं बोल पड़ा.

“तभी पता नहीं कहाँ से एक कुत्ता आ गया और मुझ पर भौंकने लगा; उसकी आवाज़ सुनकर दो-चार और कुत्ते मेरी ओर लपके. उनकी आवाज़ सुनकर पास के खेतों में काम कर रहे कुछ लोगों का ध्यान मेरी तरफ गया. अब मेरे पास भागने के अलावा कोई चारा नहीं रहा. आगे-आगे मैं, और पीछे-पीछे चार कुत्ते! मैं सीधा घर पहुँच कर ही रुका. बाद में सोचता रहा कि मैंने एक बार फिर कायरता ही दिखाई. जो आदमी कुत्ते के काटने के दर्द से घबरा गया, वह ट्रेन का झटका क्या खाक झेलता? ऊपर से तुर्रा यह कि बाप ने घंटों बिना बताये घर से बाहर रहने के लिये दुबारा जानवरों की तरह पिटाई की. मैं कायरों की तरह सब बर्दाश्त करता रहा.”

“और तीसरी बार?” मैंने पूछा.

“आत्महत्या में दूसरी बार असफल होने के बाद मैंने मान लिया कि मैं कायर ही हूँ, और आत्महत्या मेरे बूते की बात नहीं. इसलिये तीसरी बार मरने की कोशिश के बजाय मैंने घर छोड़ देने का निर्णय किया जिससे ज़िन्दा रहते हुए भी मैं घर वालों के लिये मर जाऊँ.”

” फिर?”

“फिर क्या? पेट तो भरना ही था, और रात को कहीं तो सोना ही था. मैंने कोशिश की कि साधुओं का कोई ग्रुप मुझे अपने दल में शामिल कर ले, पर साधु किसी को अपने दल में लेने से पहले बड़ी कठिन परीक्षा लेते हैं. एकाध हफ्ते मैंने साधुओं की ग़ुलामी की, पर मैंने देखा कि वह मुझे साधु बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहे थे. मजबूरन घर लौटना पड़ा. आज जब साधुओं को मौज करते देखता हूँ तो सोचता हूँ: थोड़े दिन और कष्ट क्यों न सह लिया? जवाब हर बार एक ही मिलता है: मैं कायर हूँ और कष्ट सहने से घबराता हूँ.”

“तो अब?”

“अब क्या? कायर की ज़िंदगी क्या और मौत क्या? बहादुर होता, तो मर ही गया होता; थोड़ा कम बहादुर होता तो साधु नहीं तो चोर-डाकू ही बन गया होता, पर मुझे तो यही ज़िंदगी काटनी थी, सो काट रहा हूँ.”

वह चुप हो गये और हम दोनो के बीच एक तनाव भरा सन्नाटा छा गया. कुछ देर बाद हमने एक-दूसरे से विदा ली, और उनकी बातों पर विचार करते-करते मैं घर आ गया. मेरा इरादा कुछ और विशेषज्ञों से भी मिलने का था, पर एक विशेषज्ञ से ही इतनी जानकारी मिल गयी कि अन्य किसी से मिलना निरर्थक ही जान पड़ा. अब मैं अपने मित्र के सुझावों को भारत-सरकार के पास प्रेषित करने के बारे में सोच रहा हूँ.

One thought on “आत्महत्या: अनन्त संभावनाओं का क्षेत्र

  • विजय कुमार सिंघल

    करारा व्यंग्य !
    वैसे आत्महत्या करना केवल कायरता है. मर जाने में कोई वीरता नहीं है. लेकिन किसी अच्छे कार्य के लिए अपने प्राण खतरे में डालना अवश्य वीरता है. परन्तु जो आत्म हत्या करते हैं वे जिन्दगी से निराश व्यक्ति होते हैं. उनको न तो अपने ऊपर विश्वास होता है और न प्रभु के ऊपर. इसलिए वे जल्दी टूट जाते हैं. इतनी जल्दी हार मान लेने वाले व्यक्ति कभी वीर नहीं हो सकते. जो कठिन जीवन संग्राम में टिके रहते हैं उनको ही वीर कहा जा सकता है.

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