कविता

फाईल

सरकारी दफ्तर की दबी

फाईल हूँ – मैं !

चूहे दीमक मेरे घर जमाई
दोषियो का आक्सिजन पीडितो
का इंतजार हूँ – मैं !

कोल ब्लाक व्यापम घोटाला
या कोई और रेंक में बस आराम
फरमाती हूँ – मैं !

खन्जर खून से सने हो चाहे
दोषियो के हाथ लाल रंग समझ
मुस्कुराती हूँ – मैं !

भूले बिसरे उठा भी ले कोई धूल
झाड़ भी दे मेरी बड़ी बेसकून
सी हो जाती हूँ – मैं !

नये -२ जुगाड़ खोजती दीमक
चूहो के पास जाने के सिस्टम
का काला चेहरा हूँ -मैं !

— गीता यादव

गीता यादव

, निवासी दिल्ली

2 thoughts on “फाईल

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत अच्छी कविता !

  • विभा रानी श्रीवास्तव

    अच्छी रचना

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