गीत/नवगीत

गीत

भोर की चंचल किरन ने तन छुआ औ मन छुआ |
ले गई मुझको नदी तट प्रात का मस्तक छुआ |
छू लिया उसने अधर हर
तरु तृणों औ पात का,
बैठ कर फिर जल किनारे
भैरवी का चषक छुआ |

भोर की चंचल किरन ने तन छुआ औ मन छुआ |
ले गई मुझको नदी तट प्रात का मस्तक छुआ |

मन मदिर हो बावरा सा
डोलता ज्यों नाव हो |
नभ सुनहरी भर रहा था
रग मेरे हर रस छुआ |
भोर की चंचल किरन ने तन छुआ औ मन छुआ |
ले गई मुझको नदी तट प्रात का मस्तक छुआ |

रंग बिखरे पुष्प में जो
टंक गये दृग कोर में
हर तरफ फैली धरा पर
स्निग्धता ने मन छुआ |
भोर की चंचल किरन ने तन छुआ औ मन छुआ |
ले गई मुझको नदी तट प्रात का मस्तक छुआ |

— छाया शुक्ला “छाया”

छाया शुक्ला

छाया शुक्ला "छाया" प्रकाशित पुस्तक "छाया का उज़ास"

4 thoughts on “गीत

  • सूर्यनारायण प्रजापति

    Nice song

    • छाया शुक्ला

      आदरणीय सूर्य नारायण प्रजापति जी
      गीत पसंद कर उत्साह वर्धन के लिए हार्दिक आभार !
      सादर नमन !

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत सुंदर गीत !

    • छाया शुक्ला

      आदरणीय विजय सिंघल जी
      गीत पसंद कर उत्साह वर्धन के लिए हार्दिक आभार |
      सादर नमन !

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